कुछ ऊंँटो की नस्लों में तब्दीली आई है रेगिस्तान में अबकी मिट्टी गीली आई है
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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उस पे इतना यक़ीं किया मैं ने आसमाँ को ज़मीं किया मैं ने
Aashish kargeti 'Kash'
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नहीं मालूम वो कुछ ना करें तो क्या करे दिवाली है, उसे कह दो- परेशाँ न करे
Aashish kargeti 'Kash'
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याद में रख लिया तवाईफ़ को रात में फिर से सो गया जल्दी
Aashish kargeti 'Kash'
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मना तो किया था मगर यार उठा कर के लाया गया है
Aashish kargeti 'Kash'
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ख़ामख़ाँ बेवजह और क्या बोलना बोलते बोलते ही गुज़ारी ये उम्र
Aashish kargeti 'Kash'
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