लब-ए-नाज़ुक के बोसे लूँ तो मिस्सी मुँह बनाती है कफ़-ए-पा को अगर चूमूँ तो मेहंदी रंग लाती है
sherKuch Alfaaz
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मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ काश पूछो कि मुद्दआ' क्या है
Mirza Ghalib
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धमका के बोसे लूँगा रुख़-ए-रश्क-ए-माह का चंदा वसूल होता है साहब दबाव से
Akbar Allahabadi
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लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ
Bashir Badr
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मैं रोज़ रात यही सोच कर तो सोता हूँ कि कल से वक़्त निकालूँगा ज़िन्दगी के लिए
Swapnil Tiwari
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पहले उस की ख़ुशबू मैं ने ख़ुद पर तारी की फिर मैं ने उस फूल से मिलने की तैयारी की इतना दुख था मुझ को तेरे लौट के जाने का मैं ने घर के दरवाज़ों से भी मुँह मारी की
Tehzeeb Hafi
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