sherKuch Alfaaz

मेरे हर ग़म में वो इज़ाफ़ा दानिस्ता करती है और ये काम भी वो आहिस्ता-आहिस्ता करती है

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लोग तो बस जिस्मों पर बनवाते फिरते हैं लेकिन तेरे   नाम  का  टैटू  मैं ने  दिल  पर  बनवाया  था

Nakul kumar

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इस क़दर दिल सहे ज़द ठीक नहीं इश्क़ की इतनी भी हद ठीक नहीं बंद कमरे से निकल आ बाहर दर्द की इतनी मदद ठीक नहीं

Nakul kumar

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शदीद उलझनें सब ख़्वाहिशें जला रही हैं अजीब हाल है मेरा समझ नहीं आता यूँँ ज़िंदा रहना भी क्या कोई बेवक़ूफ़ी है या कोई कमाल है मेरा समझ नहीं आता

Nakul kumar

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मुंतज़िर हूँ मैं सहर का रौशनी है तंग मेरी एक मिट्टी का दिया हूँ रात से हैं जंग मेरी

Nakul kumar

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बंजर हूँ तो बंजर ही रहने दो मुझे तुम अब मुझे कोई गुलिस्ताँ मत करो तंग आ चुके हैं हम तेरे इस इश्क़ से तुम छोड़ दो हम को परेशाँ मत करो

Nakul kumar

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