sherKuch Alfaaz

मिरे किरदार का मरना ही शायद कहानी की ज़रूरत बन गया था

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

Ahmad Faraz

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बेवजह मुझ सेे फिर ख़फ़ा क्यूँ है ये कहानी ही हर दफ़ा क्यूँ है कुछ भी मजबूरी तो नहीं दिखती मैं क्या जानूं वो बे-वफ़ा क्यूँ है

Sandeep Thakur

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मिरी ग़ज़ल की तरह उस की भी हुकूमत है तमाम मुल्क में वो सब से ख़ूब-सूरत है बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम मुझे पता चला वो कितनी ख़ूब-सूरत है

Bashir Badr

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जिस को ख़ुद मैं ने भी अपनी रूह का इरफ़ाँ समझा था वो तो शायद मेरे प्यासे होंटों की शैतानी थी

Jaun Elia

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कुल जोड़ घटाकर जो ये संसार का दुख है उतना तो मिरे इक दिल-ए-बेज़ार का दुख है शाइ'र हैं तो दुनिया से अलग थोड़ी हैं लोगों सबकी ही तरह हमपे भी घर बार का दुख है

Ashutosh Vdyarthi

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