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इसी पर बैठ कर शब भर कहानी माँ सुनाती थी तभी ख़ुशबू सी आती है मुझे इस चारपाई से

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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है

Zubair Ali Tabish

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हम भी गाँव में शाम को बैठा करते थे हम को भी हालात ने बाहर भेजा है

Zahid Bashir

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मैं ज़िन्दगी में आज पहली बार घर नहीं गया मगर तमाम रात दिल से माँ का डर नहीं गया बस एक दुख जो मेरे दिल से उम्र भर न जाएगा उस को किसी के साथ देख कर मैं मर नहीं गया

Tehzeeb Hafi

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सुहागन भी बता देगी मगर तुम पूछो विधवा से ये मंगलसूत्र ज़ेवर के अलावा भी बहुत कुछ है ये क्या इक मक़बरे को आख़री हद मान बैठे हो मोहब्बत संग-ए-मरमर के अलावा भी बहुत कुछ है

Zubair Ali Tabish

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ख़ुद से भी मिल न सको, इतने पास मत होना इश्क़ तो करना, मगर देवदास मत होना देखना, चाहना, फिर माँगना, या खो देना ये सारे खेल हैं, इन में उदास मत होना

Kumar Vishwas

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