sherKuch Alfaaz

मेरी तमाम ज़िंदगी बर्बाद कर के अब मसरूफ़ होगी ईद कि तय्यारियों में वो

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नज़र घुमा के कभी देख ले घड़ी की तरफ़ बहुत समय से कोई तेरे इंतिज़ार में है

ALI ZUHRI

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बाग़ों से पीले फूलों की रंगत चुराएगी फिर अपने सुर्ख़ होंटों पे तितली बिठाएगी ग़ुस्से में देख कर उसे महसूस ये हुआ हिंदा के जैसे मेरा कलेजा चबाएगी

ALI ZUHRI

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रेत ही रेत मिली इश्क़ सफ़र में मुझ को ज़िंदगी ख़ाक हुई और मिला कुछ भी नहीं रात भर होता है तारी किसी वहशत का गुमाँ रात ख़्वाबों की सियाहत के सिवा कुछ भी नहीं

ALI ZUHRI

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तुम एक शख़्स पे जीवन बिताते हो हद है किसी के प्यार में ख़ुद को भुलाते हो हद है तुम्हारी राह से कंकर चुने थे मैंनें दोस्त मुझे ही राह का पत्थर बताते हो हद है

ALI ZUHRI

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देख कर हुस्न तिरा चाँद बहक जाता है लड़खड़ाता हुआ अंबर से ढलक जाता है

ALI ZUHRI

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