मोजिज़ा कुछ तो है उस की आवाज़ में ज़िन्दगी यूँँ नहीं ख़ुश-नवा है मिरी
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता एक ही शख़्स था जहान में क्या
Jaun Elia
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खिल रहे हैं आजकल जो मेरी पलकों पर नींद उन ख़्वाबों में ही बिखरी पड़ी होगी
Kiran K
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ज़िन्दगी रुख़ पर जो तेरे छाई है ये ख़ामुशी आ इसे मैं चीर दूँ पाज़ेब की झंकार से
Kiran K
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गुल कभी ख़्वाब में दिखा था इक ज़ख़्म पलकों पे खिल रहे हैं अब
Kiran K
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इश्क़ तेरा हो भले औहाम ही साँस लेने की हसीं इक वज्ह है
Kiran K
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ग़ज़ल मेरी ये किस ने ज़ख़्म पर बाँधी है अपने मेरे अलफ़ाज़ किस के वास्ते मरहम हुए हैं
Kiran K
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