ग़ज़ल मेरी ये किस ने ज़ख़्म पर बाँधी है अपने मेरे अलफ़ाज़ किस के वास्ते मरहम हुए हैं
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ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है क्यूँँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
Sahir Ludhianvi
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी
Tehzeeb Hafi
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शायद मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हुई लेकिन यक़ीन सब को दिलाता रहा हूँ मैं
Jaun Elia
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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
Ahmad Faraz
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ज़िन्दगी रुख़ पर जो तेरे छाई है ये ख़ामुशी आ इसे मैं चीर दूँ पाज़ेब की झंकार से
Kiran K
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उलझ जाती हूँ अक्सर आईने से मैं तक़ाबुल में जो ख़ुद को देखती हूँ अक्स तेरा ही उभरता है
Kiran K
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ये शाम ख़ुशबू पहन के तेरी ढली है मुझ में जो रेज़ा रेज़ा मैं क़तरा क़तरा पिघल रही हूँ ख़मोश शब के समुंदरों में
Kiran K
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गुल कभी ख़्वाब में दिखा था इक ज़ख़्म पलकों पे खिल रहे हैं अब
Kiran K
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कैसे कहूँ दुनिया है ये इंसानों की इंसानियत रुस्वा है जब हर सूँ यहाँ
Kiran K
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