मुमकिन है कि सदियों भी नज़र आए न सूरज इस बार अँधेरा मिरे अंदर से उठा है
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
Sahir Ludhianvi
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आँख में नम तक आ पहुँचा हूँ उस के ग़म तक आ पहुँचा हूँ पहली बार मुहब्बत की थी आख़िरी दम तक आ पहुँचा हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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झेला है मैं ने तीन सौ पैंसठ दुखों का साल चाहो तो पिछले बारह महीनों से पूछ लो
Rehman Faris
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मैं ज़िन्दगी में आज पहली बार घर नहीं गया मगर तमाम रात दिल से माँ का डर नहीं गया बस एक दुख जो मेरे दिल से उम्र भर न जाएगा उस को किसी के साथ देख कर मैं मर नहीं गया
Tehzeeb Hafi
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याद है 'आनिस' पहले तुम ख़ुद बिखरे थे आईने ने तुम से बिखरना सीखा था
Aanis Moin
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उतारा दिल के वरक़ पर तो कितना पछताया वो इंतिसाब जो पहले बस इक किताब पे था
Aanis Moin
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गए ज़माने की चाप जिन को समझ रहे हो वो आने वाले उदास लम्हों की सिसकियाँ हैं
Aanis Moin
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गया था माँगने ख़ुशबू मैं फूल से लेकिन फटे लिबास में वो भी गदा लगा मुझ को
Aanis Moin
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था इंतिज़ार मनाएँगे मिल के दीवाली न तुम ही लौट के आए न वक़्त-ए-शाम हुआ
Aanis Moin
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