मुनाफ़क़त वफ़ा लज़्ज़त सितम हवस औरत हमें तो वैसे भी अच्छी लगी नहीं दुनिया
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रंग-ओ-रस की हवस और बस मसअला दस्तरस और बस यूँँ बुनी हैं रगें जिस्म की एक नस टस से मस और बस
Ammar Iqbal
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फिर उसी बे-वफ़ा पे मरते हैं फिर वही ज़िंदगी हमारी है
Mirza Ghalib
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उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले मैं चाहता भी यही था वो बे-वफ़ा निकले
Waseem Barelvi
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सुख़न का जोश कम होता नहीं है वगरना क्या सितम होता नहीं है भले तुम काट दो बाज़ू हमारे क़लम का सर क़लम होता नहीं है
Baghi Vikas
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ख़ुदा ने ये सिफ़त दुनिया की हर औरत को बख़्शी है कि वो पागल भी हो जाए तो बेटे याद रहते हैं
Munawwar Rana
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वो रो रहा है उसे चुप करा दो मत रोए कि इस जहाँ के लिए रो रहा यही दुनिया
Shadab bastavi
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वो मुझ सेे रोज़ कहती थी मुझे तुम चाँद ला कर दो उसे इक आइना देकर अकेला छोड़ आया हूँ
Shadab bastavi
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उस की तस्ख़ीर नहीं कोई जहाँ में साक़ी चाँद लाओ या ज़मीं को ही उलट कर देखो
Shadab bastavi
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उदासी रो के ये बोली मैं हूँ दरकार-ए-शादाबी मैं तेरी आशियाँ की सम्त उस को मोड़ आया हूँ
Shadab bastavi
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जो मर रहे हैं उन्हें क्यूँ हसीं लगी दुनिया सो इस लिए मुझे लगती है बे-हिसी दुनिया
Shadab bastavi
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