न कोई घर न कोई शख़्स कुछ भी तो नहीं बचता हवा जब आग भर के मुँह में बस्ती से गुज़रती है
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
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ज़रूरत क्या तिजारत-गार को ख़ुद हाथ रँगने की ठिकाने कुछ लगाना हो अगर सरकार बैठी है
Mohit Subran
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यक-ब-यक उट्ठा ज़ेहन से पर्दा और सब कुछ दिखाई देने लगा
Mohit Subran
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ये बात भूलें न नेता कि आम लोगों ने जभी है चाही जो सरकार वो गिरा डाली
Mohit Subran
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यही है आरज़ू अब तो कि इस चलती कहानी में मिरा किरदार मर जाए कहानी ख़त्म हो जाए
Mohit Subran
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यक़ीं ईमाँ वफ़ादारी की बातें तू न कर मुझ से तिरी ही वज्ह से खाए हैं जितने धोके खाए हैं
Mohit Subran
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