न उस ने हाथ लगाया न उस ने बातें कीं पड़े पड़े यूँँ ही ख़ुद में ख़राब हो गए हम
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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कैसा दिल और इस के क्या ग़म जी यूँँ ही बातें बनाते हैं हम जी
Jaun Elia
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँँ लगते हो
Mohsin Naqvi
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तेरा बनता था कि तू दुश्मन हो अपने हाथों से खिलाया था तुझे तेरी गाली से मुझे याद आया कितने तानों से बचाया था तुझे
Ali Zaryoun
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ये जो हम तख़्लीक़-ए-जहान-ए-नौ में लगे हैं पागल हैं दूर से हम को देखने वाले हाथ बटा हम लोगों का
Abhishek shukla
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ये आग वाग का दरिया तो खेल था हम को जो सच कहें तो बड़ा इम्तिहान आँसू हैं
Abhishek shukla
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शब भर इक आवाज़ बनाई सुब्ह हुई तो चीख़ पड़े रोज़ का इक मामूल है अब तो ख़्वाब-ज़दा हम लोगों का
Abhishek shukla
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ये जो दुनिया है इसे इतनी इजाज़त कब है हम पे अपनी ही किसी बात का ग़ुस्सा उतरा
Abhishek shukla
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पा ए उम्मीद प रक्खे हुए सर हैं हम लोग हैं न होने के बराबर ही मगर हैं हम लोग तू ने बरता ही नहीं ठीक से हम को ऐ दोस्त ऐब लगते हैं ब-ज़ाहिर प हुनर हैं हम लोग
Abhishek shukla
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