नया साल दीवार पर टाँग दे पुराने बरस का कैलेंडर गिरा
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यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे मैं समझता था मेरे यार समझते हैं मुझे
Shahid Zaki
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या'नी कि इश्क़ अपना मुकम्मल नहीं हुआ गर मैं तुम्हारे हिज्र में पागल नहीं हुआ वो शख़्स सालों बा'द भी कितना हसीन है वो रंग कैनवस पे कभी डल नहीं हुआ
Kushal Dauneria
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है
Abbas Qamar
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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गुल-दान में गुलाब की कलियाँ महक उठीं कुर्सी ने उस को देख के आग़ोश वा किया
Mohammad Alvi
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आग अपने ही लगा सकते हैं ग़ैर तो सिर्फ़ हवा देते हैं
Mohammad Alvi
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सदियों से किनारे पे खड़ा सूख रहा है इस शहर को दरिया में गिरा देना चाहिए
Mohammad Alvi
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उस से मिले ज़माना हुआ लेकिन आज भी दिल से दुआ निकलती है ख़ुश हो जहाँ भी हो
Mohammad Alvi
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थोड़ी सर्दी ज़रा सा नज़ला है शा'इरी का मिज़ाज पतला है
Mohammad Alvi
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