पेड़ गिन काटी थी राहें ख़र्च गिन कर कट रही है अम्न की उम्मीद में हैं और नफ़रत बट रही है
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तेरे लगाए हुए ज़ख़्म क्यूँँ नहीं भरते मेरे लगाए हुए पेड़ सूख जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मैं न कहता था हिज्र कुछ भी नहीं ख़ुद को हलकान कर रही थी तुम कितने आराम से हैं हम दोनों देखा बेकार डर रही थी तुम
Mehshar Afridi
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भूलभुलैया था उन ज़ुल्फ़ों में लेकिन हम को उस में अपनी राहें दिखती थीं आप की आँखों को देखा तो इल्म हुआ क्यूँँ अर्जुन को केवल आँखें दिखती थीं
Ashraf Jahangeer
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ख़मोशी तो यही बतला रही है उदासी रास मुझ को आ रही है मुझे जिन ग़लतियों से सीखना था वही फिर ज़िंदगी दोहरा रही है
Vishal Singh Tabish
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बर्बाद कर दिया हमें परदेस ने मगर माँ सब से कह रही है कि बेटा मज़े में है
Munawwar Rana
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शोहरत क्या बख़्शेगी हमें दुनिया जो ख़ुद नाकारी है
Rizwan Khoja "Kalp"
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उम्र भर मैं ने की है इबादत तिरी इश्क़ की तब हुई है इनायत तिरी
Rizwan Khoja "Kalp"
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साहिब-ए-मसनद ग़ुलामी चाहते हैं शाह वाले सर झुका के अब चला कर
Rizwan Khoja "Kalp"
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पेड़ गिन काटी थी राहें ख़र्च गिन कर कट रही है
Rizwan Khoja "Kalp"
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मत पूछ हम से हाल-ए-दिल अज़ीज़ाँ शब-भर से यादों में जला हुआ है
Rizwan Khoja "Kalp"
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