पीपल बरगद नीम यहाँ पर छाँव ढूॅंढ़ने आते हैं बूढ़े होते नगर यहाँ पर गाँव ढूॅंढ़ने आते हैं चलते-चलते थकने वाले लोग यहाँ पर आख़िर में मेरे इन क़दमों में अपने पाँव ढूॅंढ़ने आते हैं
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न हुआ नसीब क़रार-ए-जाँ हवस-ए-क़रार भी अब नहीं तिरा इंतिज़ार बहुत किया तिरा इंतिज़ार भी अब नहीं तुझे क्या ख़बर मह-ओ-साल ने हमें कैसे ज़ख़्म दिए यहाँ तिरी यादगार थी इक ख़लिश तिरी यादगार भी अब नहीं
Jaun Elia
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यूँँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँ जो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गया
Tehzeeb Hafi
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रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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मेरे आँगन में एक बूढ़ा पेड़ छाँव भी देता है, दुआएँ भी
Ankit Maurya
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ये वो क़बीला है जो हुस्न को ख़ुदा माने यहाँ पे कौन तेरी बात का बुरा माने इशारा कर दिया है आप की तरफ़ मैं ने ये बच्चे पूछ रहे थे कि बे-वफ़ा माने
Kushal Dauneria
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तुम्हें जब वक़्त मिल जाए चले आना कभी मिलने उभर आई हैं कुछ बातें वही सब बात करनी हैं तिरी आँखों में रह कर फिर नए कुछ दिन उगाने हैं तिरी ज़ुल्फ़ों तले वो कुछ पुरानी रात करनी हैं
nakul kumar
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कुछ नहीं है ज़िंदगी बर्बाद है अब तो मर गया हूँ मैं मुहब्बत को मनाने में कैसे भी गर हो सके मुझ को रिहा कर दे रह नहीं सकता मैं अब इस क़ैद-ख़ाने में
nakul kumar
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हर बार मुझे हर साँस मिरी इक बात यही समझाती है कुछ काम करो कुछ नाम करो ये उम्र निकलती जाती है मैं कहता हूँ कि समझो तो कोई बात नहीं ऐसी लेकिन इस दुनिया में शोहरत की हवस मुझे अंदर से खा जाती है
nakul kumar
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तुम जैसे ना-मुराद की सुनता रहा है वो जिस ने नहीं सुनी कभी अपनी भी आज तक
nakul kumar
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मैं न कहती हूँ कि लाओ चाँद तारे तोड़कर बस मुझे इस हाल में ऐसे न जाओ छोड़कर तुम जो हरदम ही मुझे जान-ओ-जहाँ कहते रहे जा रहे हो ज़िंदगी से क्यूँँ भला मुँह मोड़कर
nakul kumar
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