प्यार की जोत से घर घर है चराग़ाँ वर्ना एक भी शम्अ' न रौशन हो हवा के डर से
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भरम रखा है तेरे हिज्र का वरना क्या होता है मैं रोने पे आ जाऊँ तो झरना क्या होता है मेरा छोड़ो मैं नइँ थकता मेरा काम यही है लेकिन तुम ने इतने प्यार का करना क्या होता है
Tehzeeb Hafi
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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उस की जुल्फ़ें उदास हो जाए इस-क़दर रौशनी भी ठीक नहीं तुम ने नाराज़ होना छोड़ दिया इतनी नाराज़गी भी ठीक नहीं
Fahmi Badayuni
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प्यार दो बार थोड़ी होता है हो तो फिर प्यार थोड़ी होता है यही बेहतर है तुम उसे रोको मुझ सेे इनकार थोड़ी होता है
Zubair Ali Tabish
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सौ सौ उमीदें बँधती है इक इक निगाह पर मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई
Allama Iqbal
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दिल सा अनमोल रतन कौन ख़रीदेगा 'शकेब' जब बिकेगा तो ये बे-दाम ही बिक जाएगा
Shakeb Jalali
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वक़्त ने ये कहा है रुक रुक कर आज के दोस्त कल के बेगाने
Shakeb Jalali
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यही दीवार-ए-जुदाई है ज़माने वालो हर घड़ी कोई मुक़ाबिल में खड़ा रहता है
Shakeb Jalali
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सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में
Shakeb Jalali
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ये एक अब्र का टुकड़ा कहाँ कहाँ बरसे तमाम दश्त ही प्यासा दिखाई देता है
Shakeb Jalali
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