रोज़ भुनती है आतिश-ए-ग़म पर रूह अपनी कबाब की सी है
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हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं
Rahat Indori
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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और फिर एक दिन बैठे बैठे मुझे अपनी दुनिया बुरी लग गई जिस को आबाद करते हुए मेरे मां-बाप की ज़िंदगी लग गई
Tehzeeb Hafi
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ग़ुस्से में भींच लेता है बाँहों में अपनी वो क्या सोचना है फिर उसे ग़ुस्सा दिलाइए
Pooja Bhatia
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तुम ने जब से अपनी पलकों पर रक्खा कालिख़ को सब काजल काजल कहते हैं इश्क़ में पागल ही तो होना होता है पागल हैं जो मुझ को पागल कहते हैं
Vishal Bagh
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तुम्हारे शहर में आ कर ठिकाना ढूँढ़ते हैं हम अपने शहर में होते तो घर गए होते
Ajeetendra Aazi Tamaam
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छोटी सी ज़िंदगी है सनम रूठते नहीं इतनी सी बात कौन ये समझाए आप को
Ajeetendra Aazi Tamaam
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सौ ज़ख़्म दिल पे हैं मेरे सौ ज़ख़्म मेरी जाँ क्या एक-एक दिल मेरा दिखलाए आप को
Ajeetendra Aazi Tamaam
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मिरी जाँ बेबसी क्या दर्द क्या है ये उन सेे पूछना जो बे-ज़बाँ हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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बस और कुछ नहीं है मिरी जान इश्क़ है वो हर घड़ी जो इत्र सा महकाए आप को
Ajeetendra Aazi Tamaam
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