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रूह को गाँव की दहलीज़ पे रख कर इक बदन गया है शहर कमाने

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उस शहर-ए-नाकाम के बाशिंदे हैं हम जहाँ मिल कर के मुर्दे सभी ज़िंदा को दफ़नाते हैं

Chetan Verma

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तू भी ग़म-ए-हयात का है मारा और मैं भी चल इश्क़ छोड़ दर्द का रिश्ता बनाते हैं

Chetan Verma

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लोग सोने को बिस्तर नहीं अब बदन ढूँढ़ते हैं बस मसलने के मक़सद से वहशी चमन ढूँढ़ते हैं हाल इन बेटियों का जहाँ में तिरे देखते जब रात सोने को हम भी ख़ुदाया कफ़न ढूँढ़ते हैं

Chetan Verma

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घूम रहे बच्चे लिए ग़म भरी आँखें उन में तलब एक खुले आसमाँ की है

Chetan Verma

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धोखे के बा'द विश्वास पहले सा दोबारा नहीं रहता घर की दहलीज़ पे है बंजारा बंजारा नहीं रहता वो ही इश्क़ मिरी जाँ मैं तुझ सेे अब दोहराऊँ कैसे टूटा जो एक बार तारा तो फिर तारा नहीं रहता

Chetan Verma

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