sherKuch Alfaaz

सख़्त मुश्किल है ये सफ़र मेरा कैसे होगा गुज़र-बसर मेरा वक़्त ने भी सितम किया मुझ पर छीनकर के अज़ीज़-तर मेरा छाँव देता था जो मुझे वो भी है ख़िज़ाँ दीदा अब शजर मेरा हो इजाज़त जहाँ से जाने की था यहीं तक मियाँ सफ़र मेरा जिन से आगे निकल गया मैं वो काटना चाहते हैं पर मेरा साँवरे मुझ को भूल मत जाना तेरा दर ही है अब तो घर मेरा कैसे कह दूँ कुमार मैं तुम सेे हाए जीवन है मुख़्तसर मेरा

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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा

Santosh S Singh

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गले तो लगना है उस से कहो अभी लग जाए यही न हो मेरा उस के बग़ैर जी लग जाए मैं आ रहा हूँ तेरे पास ये न हो कि कहीं तेरा मज़ाक़ हो और मेरी ज़िंदगी लग जाए

Tehzeeb Hafi

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तुम ने छोड़ा तो किसी और से टकराऊँगा मैं कैसे मुमकिन है कि अंधे का कहीं सर न लगे

Umair Najmi

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कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो

Dushyant Kumar

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कबूतर इश्क़ का उतरे तो कैसे? तुम्हारी छत पे निगरानी बहुत है इरादा कर लिया गर ख़ुद-कुशी का तो ख़ुद की आँख का पानी बहुत है

Kumar Vishwas

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