समुंदर के किनारे बैठ कर साबिर ग़ज़ल लिखते रहें हैं याद में तेरी
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मैं भी इक शख़्स पे इक शर्त लगा बैठा था तुम भी इक रोज़ इसी खेल में हारोगे मुझे ईद के दिन की तरह तुम ने मुझे ज़ाया' किया मैं समझता था मुहब्बत से गुज़ारोगे मुझे
Ali Zaryoun
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हर एक लफ़्ज़ के तेवर ही और होते हैं तेरे नगर के सुख़न-वर ही और होते हैं तुम्हारी आँखों में वो बात ही नहीं ऐ दोस्त डुबोने वाले समुंदर ही और होते हैं
Abrar Kashif
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उदासी इक समुंदर है कि जिस की तह नहीं है मैं नीचे और नीचे और नीचे जा रहा हूँ
Charagh Sharma
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चाय पीते हैं कहीं बैठ के दोनों भाई जा चुकी है ना तो बस छोड़ चल आ जाने दे
Ali Zaryoun
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जाने क्या कुछ कर बैठा है बहुत दिनों से घर बैठा है वो मधुमास लिखे भी कैसे शाखों पर पतझर बैठा है
Vigyan Vrat
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ज़िंदगी से तंग आ कर मौत से मैं जा मिला हूँ
Sabir Pathan
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ज़िंदगी ख़्वाब मत दिखाया कर है गुज़ारिश उदास लोगों की
Sabir Pathan
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ज़िंदगी बर्बाद कर के देख साबिर शे'र पर इरशाद कर के देख साबिर दर्द से है आश्ना हर ज़ख़्म तो फिर दर्द से दिल शाद कर के देख साबिर
Sabir Pathan
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ज़ख़्म खा कर लौट आना पास मेरे सब लुटा कर लौट आना पास मेरे जब तुम्हें सब बेसहारा छोड़ दे तब मुँह बना कर लौट आना पास मेरे
Sabir Pathan
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वसवसे और हैं ज़माने में मर न जाऊँ उसे मनाने में नाम तेरा रटा किया हर दम याद करता रहा भुलाने में
Sabir Pathan
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