सोज़-ए-वफ़ा के नाम से अरमान थे बहुत लेकिन दयार -ए-इश्क़ से अंजान थे बहुत लगता था उन्हें इश्क़ की राहें हैं मुनाकिद आ कर के राह-ए-इश्क़ में हैरान थे बहुत
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Mirza Ghalib
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तुम बहुत ख़ुश रहोगी मेरे साथ वैसे हर इक की अपनी मर्ज़ी है
Tehzeeb Hafi
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लौट कर नहीं आता कब्र से कोई लेकिन प्यार करने वालों को इंतिज़ार रहता है
Shabeena Adeeb
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न हाथ आगे करूँँ सामने सिवाए तेरे न इतना देना कि मुझ को ग़ुरूर आ जाए
Hasan Raqim
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अपनी आदत है अगर होना तो बस एक दिल का कहने वाले इसी आदत को वफ़ा कहते हैं
Hasan Raqim
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चल रहें हैं मगर कोई मंज़िल नहीं दिल ये घर लौटने पे भी माइल नहीं
Hasan Raqim
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न बात करना, न देखना तुम, मुझे यूँँ अपना बनाए रहना मैं इश्क़ अपना करूँँगा ज़ाहिर, तुम इश्क़ अपना छुपाये रहना
Hasan Raqim
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लिखा था जिस के मुक़द्दर में वो, उसी का हुआ वो मेरा होना नहीं था मेरा हुआ भी नहीं
Hasan Raqim
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