तू है सूरज तुझे मालूम कहाँ रात का दुख तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे?
Zubair Ali Tabish
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तेरा बनता था कि तू दुश्मन हो अपने हाथों से खिलाया था तुझे तेरी गाली से मुझे याद आया कितने तानों से बचाया था तुझे
Ali Zaryoun
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
Bashir Badr
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ये झाँक लेती है दिल से जो दूसरे दिल में मेरी निगाह में सारा कमाल दर्द का है
Farhat Abbas Shah
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हर रोज़ उठाता हूँ किसी ख़्वाब की मय्यत और आप ये कहते हैं कि मातम न करूँँ मैं इक शख़्स दिखा दो मुझे हँसता हुआ दिल से गोया कि ये सब देख के भी ग़म न करूँँ मैं
Farhat Abbas Shah
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मैं बे-ख़याल कभी धूप में निकल आऊँ तो कुछ सहाब मिरे साथ साथ चलते हैं
Farhat Abbas Shah
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दर्द सहने का अलग अंदाज़ है जी रहे हैं हम अदा की ज़िंदगी
Farhat Abbas Shah
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है किसी जालिम उदू की घात दरवाज़े में है या मसाफ़त है नई या रात दरवाज़े में है जिस तरहा उठती है नजरें बे-इरादा बार-बार साफ़ लगता है के कोई बात दरवाज़े में
Farhat Abbas Shah
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