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तू हर इक बात पे जो रूठ के जाने को कहता है तिरा किरदार है बेहद अहम मेरी कहानी में

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तुम्हें जब वक़्त मिल जाए चले आना कभी मिलने उभर आई हैं कुछ बातें वही सब बात करनी हैं तिरी आँखों में रह कर फिर नए कुछ दिन उगाने हैं तिरी ज़ुल्फ़ों तले वो कुछ पुरानी रात करनी हैं

nakul kumar

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जी भर गया है अब तो जी भर चाहने वालों से भाग रहा हूँ मैं भी मुझ सेे भागने वालों से

nakul kumar

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तन्हा रहता हूँ अक्सर ही हर एक का फिर हो जाता हूँ हो जाता हूँ जैसे दुनिया फिर ख़ुद में ही खो जाता हूँ चुप-चाप पड़ा हूँ कोने में ग़म दर्द जुदाई साथ लिए जब नींद कभी आ जाए तो ख़्वाबों को बिछा सो जाता हूँ

nakul kumar

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कुछ देखता भी है नहीं बाग़-ए-बहार में जो हारता है ज़िन्दगी हर बार प्यार में कह कर गई है कपड़े सुखा दूँ तो बात हो दिन हो गए है सात मैं हूँ इंतिज़ार में

nakul kumar

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मैं न कहती हूँ कि लाओ चाँद तारे तोड़कर बस मुझे इस हाल में ऐसे न जाओ छोड़कर तुम जो हरदम ही मुझे जान-ओ-जहाँ कहते रहे जा रहे हो ज़िंदगी से क्यूँँ भला मुँह मोड़कर

nakul kumar

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