तुझ सेे कहने में क्या शरम के हम अब किसी दूसरे पे मरते हैं
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
Allama Iqbal
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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वहशत है मुझ को लम्स के रिज़्क-ए-हराम से मुझ को मेरे नसीब की रोज़ी नहीं मिली
Harun Umar
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तू बताएगा मुझे हिज्र का आलम 'हारून' मेरी हर रात गुज़रती है मोहर्रम की तरह
Harun Umar
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साहिब-ए-इल्म बने फिरते हो अच्छा बतलाओ मोहब्बत क्या है
Harun Umar
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मैं तुम को भूल जाने का कोई वा'दा नहीं करता अगरचे याद करता हूँ मगर ज़्यादा नहीं करता
Harun Umar
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तू तो चेहरे से भी मासूम नज़र आता है तुझ सेे ये किस ने कहा तू भी मोहब्बत कर ले
Harun Umar
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