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तुम मिसाल-ए-मुहब्बत हो 'सागर' तुम किसी से भी नफ़रत न करना

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सभी का है वो बस हमारा नहीं यही बात दिल को गवारा नहीं मुहब्बत ने मेरी है मारा मुझे मुझे मौत ने मेरी मारा नहीं

SAAGAR SINGH RAJPUT

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बाज़ार में नसीब का सिक्का जो चल पड़ा आक़िल मिलेगा पैर पे बैठा गँवार के ग़म छोड़ते नहीं हैं मिरा साथ और मैं बैठा हूँ इंतिज़ार में कब से बहार के

SAAGAR SINGH RAJPUT

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सभी का मशवरा है ये कि तुझ को भूल जाऊँ मैं अभी मुझ को नहीं मरना उन्हें कैसे बताऊँ मैं तिरे ही साथ जीने और मरने का इरादा है अगर तू दे इजाज़त तो तिरे सपने सजाऊँ मैं

SAAGAR SINGH RAJPUT

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पड़ेगा कूदना मँझधार में गर चाहिए मोती किसी ने भी नहीं पाया कभी मोती किनारों पर

SAAGAR SINGH RAJPUT

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उदासी जान की दुश्मन बनी है बहुत ख़तरे में मेरी ज़िंदगी है सहारा चाहिए मुझ को तुम्हारा पता इस वक़्त मेरा बम्बई है

SAAGAR SINGH RAJPUT

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