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उसे तोहफ़े में दी थी बालियाँ दो किताबें बेच आया था दुकाँ पे

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उस ने वा'दा यही किया मुझ से और फिर भी नहीं मिला मुझ से कैसे दूँगा उसे वही धोखा उस का ज़्यादा है तजरबा मुझ से

anupam shah

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लो ख़ुद मुख़्तार होकर देखते हैं कि अपने यार होकर देखते हैं बचे बर्बाद होने से हैं अब तक चलो इस बार होकर देखते हैं यहाँ से मसअला ये हल न होगा इसे उस पार होकर देखते हैं कोई ख़तरा नहीं है दुश्मनी में किसी का प्यार होकर देखते हैं

anupam shah

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ज़रूरी है अगर दीवार होना दरमियाँ अपने तो इस दीवार में तुम एक रौशनदान भी देना

anupam shah

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हज़ारों बार मर मर कर यही इक फ़लसफ़ा जाना कि जब तक ज़िंदगी है तब तलक जीना ज़रूरी है

anupam shah

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तुम्हें तो यूँँ ही किस्मत से मोहब्बत मिल गई थी ना अगर मेहनत से मिलती तो जुदा होने का ग़म होता

anupam shah

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