वो मिरे दीद को तरसते क्यूँँ ऐब गर उन को ये पता होता
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प्यार दो बार थोड़ी होता है हो तो फिर प्यार थोड़ी होता है यही बेहतर है तुम उसे रोको मुझ सेे इनकार थोड़ी होता है
Zubair Ali Tabish
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँँ लगते हो
Mohsin Naqvi
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मिरी ग़ज़ल की तरह उस की भी हुकूमत है तमाम मुल्क में वो सब से ख़ूब-सूरत है बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम मुझे पता चला वो कितनी ख़ूब-सूरत है
Bashir Badr
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ज़रा सी बात को ऐसे कहेगी हो जाऊँगा बहन हैरान जैसे
Raushan miyaa'n
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ज़रा चुप हुआ तो सुनाई दिया हमें दिल-जलों ने जला ही दिया
Raushan miyaa'n
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रौशन आग़ाज़-ए-इश्क़ है ये इक तरफ़ा चाहत होगी ही महबूब अगर अच्छा है तो खोने की दहशत होगी ही इस बे-ग़ैरत दुनिया में इक मुफ़्लिस उम्मीद लगा बैठा हो देर भले साहिब लेकिन अल्लाह की रहमत होगी ही
Raushan miyaa'n
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मैं वीराँ पड़े आशियाँ सा हुआ ग़ज़ल-दर-ग़ज़ल बे-ज़बाँ सा हुआ
Raushan miyaa'n
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उठ चले सब बे-ज़बाँ बैठे रहे हम सजा महफ़िल वहाँ बैठे रहे टालना सीखा नहीं माँ का कहा माँ ने बैठाया जहाँ बैठे रहे
Raushan miyaa'n
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