वो पहाड़ों से यूँँ नीचे देखता है जैसे अब भी बाबा नीचे बैठे होंगे
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परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है
Shakeel Azmi
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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कौन सी बात है तुम में ऐसी इतने अच्छे क्यूँँ लगते हो
Mohsin Naqvi
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं यूँँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं
Anjum Rehbar
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नज़र में भर दिखाए है मुझे उस ने नज़ारे हिज्र में क्या क्या ही होते है
Amanpreet singh
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पुरानी सी किसी अख़बार सा तो हो गया हूँ मैं जिसे पढ़ने में दिल कोई लगाता ही नहीं है अब
Amanpreet singh
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कि ग़ुर्बत ने तमाचा मारा मुँह पर फिर मोहब्बत करने वाला था मैं पागल सा
Amanpreet singh
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वही फिर बात होने से ख़फ़ा हो तुम वहीं फिर बात करने की मुआ'फ़ी है
Amanpreet singh
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तुम्हारे बा'द मैं ने तो यही सीखा तुम्हारे बा'द तो हर रंग है फीका गुलाबों पर चमेली की महक आई न जाने कब ही तुम ने ये हुनर सीखा
Amanpreet singh
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