यक़ीं करो दस्तरस हमेशा हर एक को आज़मा रही है ज़मीं से फिर आसमाँ को छूने नया ही आलम बना रही है
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हज़ार इश्क़ करो लेकिन इतना ध्यान रहे कि तुम को पहली मोहब्बत की बद-दुआ न लगे
Abbas Tabish
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सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
Khwaja Meer Dard
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तुम उन के वा'दे का ज़िक्र उन से क्यूँँ करो 'ग़ालिब' ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं
Mirza Ghalib
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आदमी देश छोड़े तो छोड़े 'अली' दिल में बसता हुआ घर नहीं छोड़ता एक मैं हूँ कि नींदें नहीं आ रही एक तू है कि बिस्तर नहीं छोड़ता
Ali Zaryoun
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निगाहें फेर ली घबरा के मैं ने वो तुम से ख़ूब-सूरत लग रही थी
Fahmi Badayuni
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ये अजीब ही हैं अदावतें जो इसी सदी का शजर नहीं वो ही दाव अब्र सा जब चले है तो बादलों का भी डर नहीं
Manohar Shimpi
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ये गोया आदमी भी आदमी होता लिहाज़-ए-इश्क़ भी तो लाज़मी होता
Manohar Shimpi
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याज़ कोई भी रहे दीवानगी भी चाहिए मसअले हालात वर्ना आज भी प्रतिकूल हैं
Manohar Shimpi
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ज़िक्र ज़ात-ओ-सिफ़ात भी होगा कोई फिर कुल्लियात भी होगा
Manohar Shimpi
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तन्हाई पे लिखी तो होगी रब ने और कहानी भी मिलती सब को काश ख़ुदा से फिर इक बार जवानी भी
Manohar Shimpi
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