ये शब का पहर ये सर्द फ़ज़ा जला के अलाव बैठे हैं हम
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ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
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अब उदास फिरते हो सर्दियों की शामों में इस तरह तो होता है इस तरह के कामों में
Shoaib Bin Aziz
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं
Rehman Faris
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मुस्कुरा बैठे हैं तुझ को मुस्कुराता देख कर वरना तेरी मुस्कराहट की क़सम ग़ुस्से में हैं
Ameer Imam
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बिछड़ के तुझ सेे न देखा गया किसी का मिलाप उड़ा दिए हैं परिंदे शजर पे बैठे हुए
Adeem Hashmi
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तुम्हारे शहर में आ कर ठिकाना ढूँढ़ते हैं हम अपने शहर में होते तो घर गए होते
Ajeetendra Aazi Tamaam
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तमाम उम्र हमें साथ साथ चलना है बस इतना कह के सफ़र कर लिया जुदा उस ने
Ajeetendra Aazi Tamaam
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तुम को क्या लेना है और तुम कौन हो रोऊँ या चिल्लाऊँ मैं जो भी करूँँ
Ajeetendra Aazi Tamaam
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उन को मिलती है सिर्फ़ तन्हाई वो जो लोगों से इश्क़ करते हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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मेरी जाँ गिर गिर के उठना सीख लो वरना तुम को तोड़ देंगी आँधियाँ
Ajeetendra Aazi Tamaam
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