ये तआक़ुब में फ़क़त अहल-ए-हवस हैं प्यारे ये भरम छोड़ कि उश्शाक़ बहुत हैं मेरे
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क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा
Javed Akhtar
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है ये राह-ए-इश्क़ है इस में क़दम ऐसे ही उठते हैं मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है
Abrar Kashif
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किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे
Umair Najmi
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Mirza Ghalib
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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वो तो कली से बन गई है अब 'अमित' गुलाब अब तितलियाँ भी बैठती हैं उस के गाल में
Daqiiq Jabaalii
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मेरे क़रीब आ ज़रा नज़रें उतार दूँ ये ज़ुल्फ़ें क्या हैं ला तेरी किस्मत सँवार दूँ बैठी रहो यूँँ ही मेरी नज़रों के सामने तुम को निहारते हुए 'उम्रें गुज़ार दूँ
Daqiiq Jabaalii
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फूलों किताबों तितलियों दरिया दिवारों से ग़म बाँटता हूँ अपना इन्हीं ग़म-गुसारों से
Daqiiq Jabaalii
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ख़ुद आप देखें कि किस तरह खप रहा है हर दिन कमाने में ज़र फ़साद है और कुछ नहीं है बशर की ख़ातिर ज़माने में ज़र
Daqiiq Jabaalii
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नमक जराहतों पे मेरे मल गए तुम भी हबीब ग़ैरों के जैसे निकल गए तुम भी
Daqiiq Jabaalii
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