फूलों किताबों तितलियों दरिया दिवारों से ग़म बाँटता हूँ अपना इन्हीं ग़म-गुसारों से
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हम ने तुझ पे छोड़ दिया है कश्ती, दरिया, भँवर, किनारा
Siddharth Saaz
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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
Nida Fazli
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वफ़ा नज़र नहीं आती कहीं ज़माने में वफ़ा का ज़िक्र किताबों में देख लेते हैं
Hafeez Banarasi
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मैं एक ठहरा हुआ पुल, तू बहता दरिया है तुझे मिलूँगा तो फिर टूट कर मिलूँगा मैं
Subhan Asad
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कौन डुबाएगा दरिया में हम को ख़ुद पर राम लिखेंगे तर जाएँगे
Rohit Gustakh
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ज़िक्र करता था जो दिन भर उस का हिज्र में मर गया शायर उस का सुनता रहता हूँ पशेमाँ हो कर ज़िक्र जब करते हैं दीगर उस का
Daqiiq Jabaalii
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ये ज़िन्दगी कुछ इस तरह से पास मेरे आई है अब तो अमित केवल यहाँ तन्हाई ही तन्हाई है
Daqiiq Jabaalii
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ज़ीस्त की सम्त से ताज़ीर बराबर आई पर मुबीं होता नहीं ग़लती हमारी क्या है
Daqiiq Jabaalii
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तुम ने 'अमित' परियों को देखा है कभी परियों के जैसे ही वो दिखती थी अमित
Daqiiq Jabaalii
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ये तआक़ुब में फ़क़त अहल-ए-हवस हैं प्यारे ये भरम छोड़ कि उश्शाक़ बहुत हैं मेरे
Daqiiq Jabaalii
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