ज़ीस्त की सम्त से ताज़ीर बराबर आई पर मुबीं होता नहीं ग़लती हमारी क्या है
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लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सँभलते क्यूँँ हैं इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँँ हैं मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूँँ हैं
Rahat Indori
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अगर है इश्क़ सच्चा तो निगाहों से बयाँ होगा ज़बाँ से बोलना भी क्या कोई इज़हार होता है
Bhaskar Shukla
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तरीक़े और भी हैं इस तरह परखा नहीं जाता चराग़ों को हवा के सामने रक्खा नहीं जाता मोहब्बत फ़ैसला करती है पहले चंद लम्हों में जहाँ पर इश्क़ होता है वहाँ सोचा नहीं जाता
Abrar Kashif
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भरम रखा है तेरे हिज्र का वरना क्या होता है मैं रोने पे आ जाऊँ तो झरना क्या होता है मेरा छोड़ो मैं नइँ थकता मेरा काम यही है लेकिन तुम ने इतने प्यार का करना क्या होता है
Tehzeeb Hafi
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तुम ने जब से अपनी पलकों पर रक्खा कालिख़ को सब काजल काजल कहते हैं इश्क़ में पागल ही तो होना होता है पागल हैं जो मुझ को पागल कहते हैं
Vishal Bagh
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तुझे भी ज़िंदगी से ग़म मिला है मुझे फिर कौन सा कुछ कम मिला है
Daqiiq Jabaalii
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वो तो कली से बन गई है अब 'अमित' गुलाब अब तितलियाँ भी बैठती हैं उस के गाल में
Daqiiq Jabaalii
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ज़िक्र करता था जो दिन भर उस का हिज्र में मर गया शायर उस का सुनता रहता हूँ पशेमाँ हो कर ज़िक्र जब करते हैं दीगर उस का
Daqiiq Jabaalii
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तुम ने 'अमित' परियों को देखा है कभी परियों के जैसे ही वो दिखती थी अमित
Daqiiq Jabaalii
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ख़ुशियाँ तो चल पड़ी पल भर में पराया कर के ध्यान तो ग़म ने रखा जैसे सगी माई हो
Daqiiq Jabaalii
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