sherKuch Alfaaz

ज़माने से जुदा लगते हुए हम मिलेंगे आप से हँसते हुए हम हमारे सामने से ही गया वो खड़े थे हाथ को मलते हुए हम

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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है

Tehzeeb Hafi

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मेरे आँसू नहीं थम रहे कि वो मुझ सेे जुदा हो गया और तुम कह रहे हो कि छोड़ो अब ऐसा भी क्या हो गया मय-कदों में मेरी लाइनें पढ़ते फिरते हैं लोग मैं ने जो कुछ भी पी कर कहा फ़लसफ़ा हो गया

Tehzeeb Hafi

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आज इक और बरस बीत गया उस के बग़ैर जिस के होते हुए होते थे ज़माने मेरे

Ahmad Faraz

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इस तरह रोते हैं हम याद तुझे करते हुए जैसे तू होता तो सीने से लगा लेता हमें

Vikram Gaur Vairagi

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और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

Faiz Ahmad Faiz

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