ज़िक्र-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार रहने दो अभी मसअला है ज़ीस्त का उलझा हुआ
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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कुछ इशारा जो किया हम ने मुलाक़ात के वक़्त टाल कर कहने लगे दिन है अभी रात के वक़्त
Insha Allah Khan
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दबी कुचली हुई सब ख़्वाहिशों के सर निकल आए ज़रा पैसा हुआ तो च्यूँँटियों के पर निकल आए अभी उड़ते नहीं तो फ़ाख़्ता के साथ हैं बच्चे अकेला छोड़ देंगे माँ को जिस दिन पर निकल आए
Mehshar Afridi
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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बिछड़ते वक़्त भी हिम्मत नहीं जुटा पाया कभी भी उस को गले से नहीं लगा पाया किसी को चाहते रहने की सज़ा पाई है मैं चार साल में लड़की नहीं पटा पाया
Shadab Asghar
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