आइने का साथ प्यारा था कभी एक चेहरे पर गुज़ारा था कभी आज सब कहते हैं जिस को नाख़ुदा हम ने उस को पार उतारा था कभी ये मिरे घर की फ़ज़ा को क्या हुआ कब यहाँ मेरा तुम्हारा था कभी था मगर सब कुछ न था दरिया के पार इस किनारे भी किनारा था कभी कैसे टुकड़ों में उसे कर लूँ क़ुबूल जो मिरा सारे का सारा था कभी आज कितने ग़म हैं रोने के लिए इक तिरे दुख का सहारा था कभी जुस्तुजू इतनी भी बे-मा'नी न थी मंज़िलों ने भी पुकारा था कभी ये नए गुमराह क्या जानें मुझे मैं सफ़र का इस्तिआ'रा था कभी इश्क़ के क़िस्से न छेड़ो दोस्तो मैं इसी मैदाँ में हारा था कभी
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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
Vikram Gaur Vairagi
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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उस ने दो चार कर दिया मुझ को ज़ेहनी बीमार कर दिया मुझ को क्यूँ नहीं दस्तरस में तू मेरे क्यूँ तलबगार कर दिया मुझ को कभी पत्थर कभी ख़ुदा उस ने चाहा जो यार कर दिया मुझ को उस सेे कोई सवाल मत करना उस ने इनकार कर दिया मुझ को एक इंसान ही तो माँगा था उस को भी मार कर दिया मुझ को
Himanshi babra KATIB
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी
Zubair Ali Tabish
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लोग सह लेते थे हँस कर कभी बे-ज़ारी भी अब तो मश्कूक हुई अपनी मिलन-सारी भी वार कुछ ख़ाली गए मेरे तो फिर आ ही गई अपने दुश्मन को दुआ देने की हुश्यारी भी उम्र भर किस ने भला ग़ौर से देखा था मुझे वक़्त कम हो तो सजा देती है बीमारी भी किस तरह आए हैं इस पहली मुलाक़ात तलक और मुकम्मल है जुदा होने की तय्यारी भी ऊब जाता हूँ ज़ेहानत की नुमाइश से तो फिर लुत्फ़ देता है ये लहजा मुझे बाज़ारी भी उम्र बढ़ती है मगर हम वहीं ठहरे हुए हैं ठोकरें खाईं तो कुछ आए समझदारी भी अब जो किरदार मुझे करना है मुश्किल है बहुत मस्त होने का दिखावा भी है सर भारी भी
Shariq Kaifi
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कम से कम दुनिया से इतना मिरा रिश्ता हो जाए कोई मेरा भी बुरा चाहने वाला हो जाए इसी मजबूरी में ये भीड़ इकट्ठा है यहाँ जो तिरे साथ नहीं आए वो तन्हा हो जाए शुक्र उस का अदा करने का ख़याल आए किसे अब्र जब इतना घना हो कि अँधेरा हो जाए हाँ नहीं चाहिए उस दर्जा मोहब्बत तेरी कि मिरा सच भी तिरे झूट का हिस्सा हो जाए बंद आँखों ने सराबों से बचाया है मुझे आँख वाला हो तो इस खेल में अंधा हो जाए मैं भी क़तरा हूँ तिरी बात समझ सकता हूँ ये कि मिट जाने के डर से कोई दरिया हो जाए बस इसी बात पे आईनों से बिगड़ी मेरी चाहता था मिरा अपना कोई चेहरा हो जाए बज़्म-ए-याराँ में यही रंग तो देते हैं मज़ा कोई रोए तो हँसी से कोई दोहरा हो जाए
Shariq Kaifi
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कुछ क़दम और मुझे जिस्म को ढोना है यहाँ साथ लाया हूँ उसी को जिसे खोना है यहाँ भीड़ छट जाएगी पल में ये ख़बर उड़ते ही अब कोई और तमाशा नहीं होना है यहाँ ये भँवर कौन सा मोती मुझे दे सकता है बात ये है कि मुझे ख़ुद को डुबोना है यहाँ क्या मिला दश्त में आ कर तिरे दीवाने को घर के जैसा ही अगर जागना सोना है यहाँ कुछ भी हो जाए न मानूँगा मगर जिस्म की बात आज मुजरिम तो किसी और को होना है यहाँ यूँँ भी दरकार है मुझ को किसी बीनाई का लम्स अब किसी और का होना मिरा होना है यहाँ अश्क पलकों पे सजा लूँ मैं अभी से 'शारिक़' शब है बाक़ी तो तिरा ज़िक्र भी होना है यहाँ
Shariq Kaifi
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सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है सोते में भी जैसे कोई सिसकी लेता है घर में तो इस माहौल का मैं आदी हूँ लेकिन बाज़ारों की वीरानी से दम घुटता है मुद्दत से मैं सोच रहा था अब समझा हूँ जेब और आँख के ख़ाली-पन में क्या रिश्ता है इतने लोग मुझे रुख़्सत करने आए हैं घर वापस जाना भी तमाशा सा लगता है लोग तो अपनी जानिब से कुछ जोड़ ही लेंगे इतनी अधूरी बातें हैं वो क्यूँँ करता है अपनी क्या इन रस्तों के बारे में सोचूँ उन का सफ़र तो मेरी उम्र से भी लम्बा है उस की आँखों से ओझल मत होना 'शारिक़' पीछा करने वाला बहुत तन्हा होता है
Shariq Kaifi
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तिरी तरफ़ से तो हाँ मान कर ही चलना है कि सारा खेल इस उम्मीद पर ही चलना है क़दम ठहर ही गए हैं तिरी गली में तो फिर यहाँ से कोई दुआ माँग कर ही चलना है रहे हो साथ तो कुछ वक़्त और दे दो हमें यहाँ से लौट के बस अब तो घर ही चलना है मुख़ालिफ़त पे हवाओं की क्यूँ परेशाँ हों तुम्हारी सम्त अगर उम्र भर ही चलना है कोई उमीद नहीं खिड़कियों को बंद करो कि अब तो दश्त-ए-बला का सफ़र ही चलना है ज़रा सा क़ुर्ब मुयस्सर तो आए उस का मुझे कि उस के बा'द ज़बाँ का हुनर ही चलना है
Shariq Kaifi
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