आज रो कर तो दिखाए कोई ऐसा रोना याद कर ऐ दिल-ए-ख़ामोश वो अपना रोना रक़्स करना कभी ख़्वाबों के शबिस्तानों में कभी यादों के सुतूनों से लिपटना रोना तुझ से सीखे कोई रोने का सलीक़ा ऐ अब्र कहीं क़तरा न गिराना कहीं दरिया रोना रस्म-ए-दुनिया भी वही राह-ए-तमन्ना भी वही वही मिल बैठ के हँसना वही तन्हा रोना ये तिरा तौर समझ में नहीं आया 'मुश्ताक़' कभी हँसते चले जाना कभी इतना रोना
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
Tehzeeb Hafi
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को ये नया खेल मिला है मेरी तन्हाई को था जो सीने में चराग़-ए-दिल-पुर-ख़ूँ न रहा चाटिए बैठ के अब सब्र-ओ-शकेबाई को दिल-ए-अफ़सुर्दा किसी तरह बहलता ही नहीं क्या करें आप की इस हौसला-अफ़ज़ाई को ख़ैर बदनाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन तुझ से मिलना था कि पर लग गए रुस्वाई को निगह-ए-नाज़ न मिलते हुए घबरा हम से हम मोहब्बत नहीं कहने के शनासाई को दिल है नैरंगी-ए-अय्याम पे हैराँ अब तक इतनी सी बात भी मालूम नहीं भाई को
Ahmad Mushtaq
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ये कौन ख़्वाब में छू कर चला गया मिरे लब पुकारता हूँ तो देते नहीं सदा मिरे लब ये और बात किसी के लबों तलक न गए मगर क़रीब से गुज़रे हैं बार-हा मिरे लब अब उस की शक्ल भी मुश्किल से याद आती है वो जिस के नाम से होते न थे जुदा मिरे लब अब एक उमर से गुफ़्त-ओ-शुनीद भी तो नहीं हैं बे-नसीब मिरे कान बे-नवा मिरे लब ये शाख़साना-ए-वहम-ओ-गुमान था शायद कुजा वो समरा-ए-बाग़-ए-तलब कुजा मिरे लब
Ahmad Mushtaq
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शबनम को रेत फूल को काँटा बना दिया हम ने तो अपने बाग़ को सहरा बना दिया इस ऊँच नीच पर तो ठहरते नहीं थे पाँव किस दस्त-ए-शौक़ ने इसे दुनिया बना दिया किन मुट्ठियों ने बीज बिखेरे ज़मीन पर किन बारिशों ने इस को तमाशा बना दिया सैराब कर दिया तिरी मौज-ए-ख़िराम ने रक्खा जहाँ क़दम वहाँ दरिया बना दिया इक रात चाँदनी मिरे बिस्तर पे आई थी मैं ने तराश कर तिरा चेहरा बना दिया पूछे अगर कोई तो उसे क्या बताऊँ मैं दिल क्या था, तेरे ग़म ने इसे क्या बना दिया
Ahmad Mushtaq
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चाँद उस घर के दरीचों के बराबर आया दिल-ए-मुश्ताक़ ठहर जा वही मंज़र आया मैं बहुत ख़ुश था कड़ी धूप के सन्नाटे में क्यूँँ तिरी याद का बादल मिरे सर पर आया बुझ गई रौनक़-ए-परवाना तो महफ़िल चमकी सो गए अहल-ए-तमन्ना तो सितमगर आया यार सब जम्अ' हुए रात की ख़ामोशी में कोई रो कर तो कोई बाल बना कर आया
Ahmad Mushtaq
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ये तन्हा रात ये गहरी फ़ज़ाएँ उसे ढूँडें कि उस को भूल जाएँ ख़यालों की घनी ख़ामोशियों में घुली जाती हैं लफ़्ज़ों की सदाएँ ये रस्ते रहरवों से भागते हैं यहाँ छुप छुप के चलती हैं हवाएँ ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है इसे देखें कि इस में डूब जाएँ जो ग़म जलते हैं शे'रों की चिता में उन्हें फिर अपने सीने से लगाएँ चलो ऐसा मकाँ आबाद कर लें जहाँ लोगों की आवाज़ें न आएँ ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है इसे देखें कि इस में डूब जाएँ जो ग़म जलते हैं शे'रों की चिता में उन्हें फिर अपने सीने से लगाएँ चलो ऐसा मकाँ आबाद कर लें जहाँ लोगों की आवाज़ें न आएँ
Ahmad Mushtaq
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