ghazalKuch Alfaaz

ये तन्हा रात ये गहरी फ़ज़ाएँ  उसे ढूँडें कि उस को भूल जाएँ  ख़यालों की घनी ख़ामोशियों में  घुली जाती हैं लफ़्ज़ों की सदाएँ  ये रस्ते रहरवों से भागते हैं  यहाँ छुप छुप के चलती हैं हवाएँ  ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है  इसे देखें कि इस में डूब जाएँ  जो ग़म जलते हैं शे'रों की चिता में  उन्हें फिर अपने सीने से लगाएँ  चलो ऐसा मकाँ आबाद कर लें  जहाँ लोगों की आवाज़ें न आएँ  ये पानी ख़ामुशी से बह रहा है  इसे देखें कि इस में डूब जाएँ  जो ग़म जलते हैं शे'रों की चिता में  उन्हें फिर अपने सीने से लगाएँ  चलो ऐसा मकाँ आबाद कर लें  जहाँ लोगों की आवाज़ें न आएँ

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi

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आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

Tehzeeb Hafi

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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महीनों बा'द दफ्तर आ रहे हैं हम एक सद में से बाहर आ रहे हैं तेरी बाहों से दिल उकता गया हैं अब इस झूले में चक्कर आ रहे हैं कहाँ सोया है चौकीदार मेरा ये कैसे लोग अंदर आ रहे हैं समुंदर कर चुका तस्लीम हम को खजाने ख़ुद ही ऊपर आ रहे हैं यही एक दिन बचा था देखने को उसे बस में बिठा कर आ रहे हैं

Tehzeeb Hafi

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हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को ये नया खेल मिला है मेरी तन्हाई को था जो सीने में चराग़-ए-दिल-पुर-ख़ूँ न रहा चाटिए बैठ के अब सब्र-ओ-शकेबाई को दिल-ए-अफ़सुर्दा किसी तरह बहलता ही नहीं क्या करें आप की इस हौसला-अफ़ज़ाई को ख़ैर बदनाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन तुझ से मिलना था कि पर लग गए रुस्वाई को निगह-ए-नाज़ न मिलते हुए घबरा हम से हम मोहब्बत नहीं कहने के शनासाई को दिल है नैरंगी-ए-अय्याम पे हैराँ अब तक इतनी सी बात भी मालूम नहीं भाई को

Ahmad Mushtaq

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अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए इश्क़-ओ-हवस हैं सब फ़रेब आप से क्या छुपाइए उस ने कहा कि याद हैं रंग तुलू-ए-इश्क़ के मैं ने कहा कि छोड़िए अब उन्हें भूल जाइए कैसे नफ़ीस थे मकाँ साफ़ था कितना आसमाँ मैं ने कहा कि वो समाँ आज कहाँ से लाइए कुछ तो सुराग़ मिल सके मौसम-ए-दर्द-ए-हिज्र का संग-ए-जमाल-ए-यार पर नक़्श कोई बनाइए कोई शरर नहीं बचा पिछले बरस की राख में हम-नफ़्सान-ए-शो'ला-ख़ू आग नई जलाइए

Ahmad Mushtaq

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कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है कि थरथरी सी अजब जिस्म-ओ-जाँ में रहती है क़दम क़दम पे वही चश्म ओ लब वही गेसू तमाम उम्र नज़र इम्तिहाँ में रहती है मज़ा तो ये है कि वो ख़ुद तो है नए घर में और उस की याद पुराने मकाँ में रहती है पता तो फ़स्ल-ए-गुल-ओ-लाला का नहीं मालूम सुना है क़ुर्ब-ओ-जवार-ए-ख़िज़ाँ में रहती है मैं कितना वहम करूँँ लेकिन इक शुआ-ए-यक़ीं कहीं नवाह-ए-दिल-ए-बद-गुमाँ में रहती है हज़ार जान खपाता रहूँ मगर फिर भी कमी सी कुछ मिरे तर्ज़-ए-बयाँ में रहती है

Ahmad Mushtaq

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शाम होती है तो याद आती है सारी बातें वो दोपहरों की ख़मोशी वो हमारी बातें आँखें खोलूँ तो दिखाई नहीं देता कोई बंद करता हूँ तो हो जाती हैं जारी बातें कभी इक हर्फ़ निकलता नहीं मुँह से मेरे कभी इक साँस में कर जाता हूँ सारी बातें जाने किस ख़ाक में पोशीदा हैं आँसू मेरे किन फ़ज़ाओं में मुअ'ल्लक़ हैं तुम्हारी बातें किस मुलाक़ात की उम्मीद लिए बैठा हूँ मैं ने किस दिन पे उठा रक्खी हैं सारी बातें

Ahmad Mushtaq

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हमें सब अहल-ए-हवस ना-पसंद रखते हैं कि हम नवा-ए-मोहब्बत बुलंद रखते हैं इसी लिए तो ख़फ़ा हैं सितम-शिआर कि हम निगाह-ए-नर्म ओ दिल-ए-दर्दमंद रखते हैं अगरचे दिल वही रजअत-पसंद है अपना मगर ज़बान तरक़्क़ी-पसंद रखते हैं हम ऐसे अर्श-नशीनों से वो दरख़्त अच्छे जो आँधियों में भी सर को बुलंद रखते हैं चले हो देखने 'मुश्ताक़' जिन को पिछली रात वो लोग शाम से दरवाज़ा बंद रखते हैं

Ahmad Mushtaq

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