ghazalKuch Alfaaz

शाम होती है तो याद आती है सारी बातें वो दोपहरों की ख़मोशी वो हमारी बातें आँखें खोलूँ तो दिखाई नहीं देता कोई बंद करता हूँ तो हो जाती हैं जारी बातें कभी इक हर्फ़ निकलता नहीं मुँह से मेरे कभी इक साँस में कर जाता हूँ सारी बातें जाने किस ख़ाक में पोशीदा हैं आँसू मेरे किन फ़ज़ाओं में मुअ'ल्लक़ हैं तुम्हारी बातें किस मुलाक़ात की उम्मीद लिए बैठा हूँ मैं ने किस दिन पे उठा रक्खी हैं सारी बातें

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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इस तरह से न आज़माओ मुझे उस की तस्वीर मत दिखाओ मुझे ऐन मुमकिन है मैं पलट आऊँ उस की आवाज़ में बुलाओ मुझे मैं ने बोला था याद मत आना झूठ बोला था याद आओ मुझे

Ali Zaryoun

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ये कौन ख़्वाब में छू कर चला गया मिरे लब पुकारता हूँ तो देते नहीं सदा मिरे लब ये और बात किसी के लबों तलक न गए मगर क़रीब से गुज़रे हैं बार-हा मिरे लब अब उस की शक्ल भी मुश्किल से याद आती है वो जिस के नाम से होते न थे जुदा मिरे लब अब एक उमर से गुफ़्त-ओ-शुनीद भी तो नहीं हैं बे-नसीब मिरे कान बे-नवा मिरे लब ये शाख़साना-ए-वहम-ओ-गुमान था शायद कुजा वो समरा-ए-बाग़-ए-तलब कुजा मिरे लब

Ahmad Mushtaq

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हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को ये नया खेल मिला है मेरी तन्हाई को था जो सीने में चराग़-ए-दिल-पुर-ख़ूँ न रहा चाटिए बैठ के अब सब्र-ओ-शकेबाई को दिल-ए-अफ़सुर्दा किसी तरह बहलता ही नहीं क्या करें आप की इस हौसला-अफ़ज़ाई को ख़ैर बदनाम तो पहले भी बहुत थे लेकिन तुझ से मिलना था कि पर लग गए रुस्वाई को निगह-ए-नाज़ न मिलते हुए घबरा हम से हम मोहब्बत नहीं कहने के शनासाई को दिल है नैरंगी-ए-अय्याम पे हैराँ अब तक इतनी सी बात भी मालूम नहीं भाई को

Ahmad Mushtaq

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अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए इश्क़-ओ-हवस हैं सब फ़रेब आप से क्या छुपाइए उस ने कहा कि याद हैं रंग तुलू-ए-इश्क़ के मैं ने कहा कि छोड़िए अब उन्हें भूल जाइए कैसे नफ़ीस थे मकाँ साफ़ था कितना आसमाँ मैं ने कहा कि वो समाँ आज कहाँ से लाइए कुछ तो सुराग़ मिल सके मौसम-ए-दर्द-ए-हिज्र का संग-ए-जमाल-ए-यार पर नक़्श कोई बनाइए कोई शरर नहीं बचा पिछले बरस की राख में हम-नफ़्सान-ए-शो'ला-ख़ू आग नई जलाइए

Ahmad Mushtaq

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खड़े हैं दिल में जो बर्ग-ओ-समर लगाए हुए तुम्हारे हाथ के हैं ये शजर लगाए हुए बहुत उदास हो तुम और मैं भी बैठा हूँ गए दिनों की कमर से कमर लगाए हुए अभी सिपाह-ए-सितम ख़ेमा-ज़न है चार तरफ़ अभी पड़े रहो ज़ंजीर-ए-दर लगाए हुए कहाँ कहाँ न गए आलम-ए-ख़याल में हम नज़र किसी के दर-ओ-बाम पर लगाए हुए वो शब को चीर के सूरज निकाल भी लाए हम आज तक हैं उम्मीद-ए-सहर लगाए हुए दिलों की आग जलाओ कि एक उम्र हुई सदा-ए-नाल-ए-दूद-ओ-शरर लगाए हुए

Ahmad Mushtaq

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शबनम को रेत फूल को काँटा बना दिया हम ने तो अपने बाग़ को सहरा बना दिया इस ऊँच नीच पर तो ठहरते नहीं थे पाँव किस दस्त-ए-शौक़ ने इसे दुनिया बना दिया किन मुट्ठियों ने बीज बिखेरे ज़मीन पर किन बारिशों ने इस को तमाशा बना दिया सैराब कर दिया तिरी मौज-ए-ख़िराम ने रक्खा जहाँ क़दम वहाँ दरिया बना दिया इक रात चाँदनी मिरे बिस्तर पे आई थी मैं ने तराश कर तिरा चेहरा बना दिया पूछे अगर कोई तो उसे क्या बताऊँ मैं दिल क्या था, तेरे ग़म ने इसे क्या बना दिया

Ahmad Mushtaq

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