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आरज़ू है वफ़ा करे कोई जी न चाहे तो क्या करे कोई गर मरज़ हो दवा करे कोई मरने वाले का क्या करे कोई कोसते हैं जले हुए क्या क्या अपने हक़ में दुआ करे कोई उन से सब अपनी अपनी कहते हैं मेरा मतलब अदा करे कोई चाह से आप को तो नफ़रत है मुझ को चाहे ख़ुदा करे कोई उस गिले को गिला नहीं कहते गर मज़े का गिला करे कोई ये मिली दाद रंज-ए-फ़ुर्क़त की और दिल का कहा करे कोई तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर तुम से फिर बात क्या करे कोई कहते हैं हम नहीं ख़ुदा-ए-करीम क्यूँँ हमारी ख़ता करे कोई जिस में लाखों बरस की हूरें हों ऐसी जन्नत को क्या करे कोई इस जफ़ा पर तुम्हें तमन्ना है कि मिरी इल्तिजा करे कोई मुँह लगाते ही 'दाग़' इतराया लुत्फ़ है फिर जफ़ा करे कोई

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं सुनसान घर ये क्यूँँ न हो मेहमान तो गया क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया होश ओ हवा से ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

Dagh Dehlvi

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राह पर उन को लगा लाए तो हैं बातों में और खुल जाएँगे दो चार मुलाक़ातों में ये भी तुम जानते हो चंद मुलाक़ातों में आज़माया है तुम्हें हम ने कई बातों में ग़ैर के सर की बलाएँ जो नहीं लें ज़ालिम क्या मिरे क़त्ल को भी जान नहीं हाथों में अब्र-ए-रहमत ही बरसता नज़र आया ज़ाहिद ख़ाक उड़ती कभी देखी न ख़राबातों में यारब उस चाँद के टुकड़े को कहाँ से लाऊँ रौशनी जिस की हो इन तारों भरी रातों में तुम्हीं इंसाफ़ से ऐ हज़रत नासेह कह दो लुत्फ़ उन बातों में आता है कि इन बातों में दौड़ कर दस्त-ए-दुआ' साथ दुआ के जाते हाए पैदा न हुए पाँव मिरे हाथों में जल्वा-ए-यार से जब बज़्म में ग़श आया है तो रक़ीबों ने सँभाला है मुझे हाथों में ऐसी तक़रीर सुनी थी न कभी शोख़-ओ-शरीर तेरी आँखों के भी फ़ित्ने हैं तिरी बातों में हम से इनकार हुआ ग़ैर से इक़रार हुआ फ़ैसला ख़ूब किया आप ने दो बातों में हफ़्त अफ़्लाक हैं लेकिन नहीं खुलता ये हिजाब कौन सा दुश्मन-ए-उश्शाक़ हैं इन सातों में और सुनते अभी रिंदों से जनाब-ए-वाइज़ चल दिए आप तो दो-चार सलावातों में हम ने देखा उन्हीं लोगों को तिरा दम भरते जिन की शोहरत थी ये हरगिज़ नहीं इन बातों में भेजे देता है उन्हें इश्क़ मता-ए-दिल-ओ-जाँ एक सरकार लुटी जाती है सौग़ातों में दिल कुछ आगाह तो हो शेवा-ए-अय्यारी से इस लिए आप हम आते हैं तिरी घातों में वस्ल कैसा वो किसी तरह बहलते ही न थे शाम से सुब्ह हुई उन की मुदारातों में वो गए दिन जो रहे याद बुतों की ऐ 'दाग़' रात भर अब तो गुज़रती है मुनाजातों में

Dagh Dehlvi

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इस अदास वो जफ़ा करते हैं कोई जाने कि वफ़ा करते हैं यूँँ वफ़ा अहद-ए-वफ़ा करते हैं आप क्या कहते हैं क्या करते हैं हम को छेड़ोगे तो पछताओगे हँसने वालों से हँसा करते हैं नामा-बर तुझ को सलीक़ा ही नहीं काम बातों में बना करते हैं चलिए आशिक़ का जनाज़ा उट्ठा आप बैठे हुए क्या करते हैं ये बताता नहीं कोई मुझ को दिल जो आता है तो क्या करते हैं हुस्न का हक़ नहीं रहता बाक़ी हर अदा में वो अदा करते हैं तीर आख़िर बदल-ए-काफ़िर है हम अख़ीर आज दुआ करते हैं रोते हैं ग़ैर का रोना पहरों ये हँसी मुझ से हँसा करते हैं इस लिए दिल को लगा रक्खा है इस में महबूब रहा करते हैं तुम मिलोगे न वहाँ भी हम से हश्र से पहले गिला करते हैं झाँक कर रौज़न-ए-दर से मुझ को क्या वो शोख़ी से हया करते हैं उस ने एहसान जता कर ये कहा आप किस मुँह से गिला करते हैं रोज़ लेते हैं नया दिल दिलबर नहीं मालूम ये क्या करते हैं 'दाग़' तू देख तो क्या होता है जब्र पर सब्र किया करते हैं

Dagh Dehlvi

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सबक़ ऐसा पढ़ा दिया तू ने दिल से सब कुछ भला दिया तू ने हम निकम्में हुए ज़माने के काम ऐसा सिखा दिया तू ने कुछ तअ'ल्लुक़ रहा न दुनिया से शग़्ल ऐसा बता दिया तू ने किस ख़ुशी की ख़बर सुना के मुझे ग़म का पुतला बना दिया तू ने क्या बताऊँ कि क्या लिया मैं ने क्या कहूँ मैं की क्या दिया तू ने बे-तलब जो मिला मिला मुझ को बे-ग़रज़ जो दिया दिया तू ने उम्र-ए-जावेद ख़िज़्र को बख़्शी आब-ए-हैवाँ पिला दिया तू ने नार-ए-नमरूद को किया गुलज़ार दोस्त को यूँँ बचा दिया तू ने दस्त-ए-मूसा में फ़ैज़ बख़्शिश है नूर-ओ-लौह-ओ-असा दिया तू ने सुब्ह मौज नसीम गुलशन को नफ़स-ए-जाँ-फ़ज़ा दिया तू ने शब-ए-तीरा में शम्अ'' रौशन को नूर ख़ुर्शीद का दिया तू ने नग़्मा बुलबुल को रंग-ओ-बू गुल को दिल-कश-ओ-ख़ुशनुमा दिया तू ने कहीं मुश्ताक़ से हिजाब हुआ कहीं पर्दा उठा दिया तू ने था मिरा मुँह न क़ाबिल-ए-लब्बैक का'बा मुझ को दिखा दिया तू ने जिस क़दर मैं ने तुझ से ख़्वाहिश की इस से मुझ को सिवा दिया तू ने रहबर-ए-ख़िज़्र-ओ-हादी-ए-इल्यास मुझ को वो रहनुमा दिया तू ने मिट गए दिल से नक़्श-ए-बातिल सब नक़्शा अपना जमा दिया तू ने है यही राह मंज़िल-ए-मक़्सूद ख़ूब रस्ते लगा दिया तू ने मुझ गुनहगार को जो बख़्श दिया तो जहन्नुम को क्या दिया तू ने 'दाग़' को कौन देने वाला था जो दिया ऐ ख़ुदा दिया तू ने

Dagh Dehlvi

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इस नहीं का कोई इलाज नहीं रोज़ कहते हैं आप आज नहीं कल जो था आज वो मिज़ाज नहीं इस तलव्वुन का कुछ इलाज नहीं आइना देखते ही इतराए फिर ये क्या है अगर मिज़ाज नहीं ले के दिल रख लो काम आएगा गो अभी तुम को एहतियाज नहीं हो सकें हम मिज़ाज-दाँ क्यूँँकर हम को मिलता तिरा मिज़ाज नहीं चुप लगी लाल-ए-जाँ-फ़ज़ा को तिरे इस मसीहा का कुछ इलाज नहीं दिल-ए-बे-मुद्दआ ख़ुदा ने दिया अब किसी शय की एहतियाज नहीं खोटे दामों में ये भी क्या ठहरा दिरहम-ए-'दाग़' का रिवाज नहीं बे-नियाज़ी की शान कहती है बंदगी की कुछ एहतियाज नहीं दिल-लगी कीजिए रक़ीबों से इस तरह का मिरा मिज़ाज नहीं इश्क़ है पादशाह-ए-आलम-गीर गरचे ज़ाहिर में तख़्त-ओ-ताज नहीं दर्द-ए-फ़ुर्क़त की गो दवा है विसाल इस के क़ाबिल भी हर मिज़ाज नहीं यास ने क्या बुझा दिया दिल को कि तड़प कैसी इख़्तिलाज नहीं हम तो सीरत-पसंद आशिक़ हैं ख़ूब-रू क्या जो ख़ुश-मिज़ाज नहीं हूर से पूछता हूँ जन्नत में इस जगह क्या बुतों का राज नहीं सब्र भी दिल को 'दाग़' दे लेंगे अभी कुछ इस की एहतियाज नहीं

Dagh Dehlvi

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