अब तो सहरा में रहेंगे चल के दीवानों के साथ दहर में मुश्किल हुआ जीना जो फ़र्ज़ानों के साथ ख़त्म हो जाएँगे क़िस्से कल ये दीवानों के साथ फिर इन्हें दोहराओगे तुम कितने उनवानों के साथ बज़्म में हम को बुला कर आप उठ कर चल दिए क्या सुलूक-ए-नारवा जाएज़ है मेहमानों के साथ नफ़रतें फैला रहे हैं कैसी शैख़-ओ-बरहमन क्या शुमार इन का करेंगे आप इंसानों के साथ उन की आँखों की गुलाबी से जो हम मख़मूर हैं इक तअ'ल्लुक़ है क़दीमी हम को पैमानों के साथ हर तरफ़ कू-ए-बुताँ में हसरतों का है हुजूम एक दिल लाए थे हम तो अपना अरमानों के साथ कल तलक दानाओं की सोहबत में थे सब के इमाम आज कैसे सुस्त हैं यूँँ शैख़ नादानों के साथ उन की आँखें इक तरफ़ ये जाम-ओ-मीना इक तरफ़ किस तरह गर्दिश में हैं पैमाने पैमानों के साथ आशिक़ों के दिल में शब फ़ानूस रौशन हो गए शम्अ''' का जीना है लाज़िम अपने परवानों के साथ हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में गुल यगाने हो गए लहलहा कर अब रहेगा सब्ज़ा बेगानों के साथ
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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पहले तो दाम-ए-ज़ुल्फ़ में उलझा लिया मुझे भूले से फिर कभी न दिलासा दिया मुझे क्या दर्दनाक मंज़र-ए-कश्ती था रूद में मैं ना-ख़ुदा को देख रहा था ख़ुदा मुझे बैठा हुआ है रश्क-ए-मसीहा मिरे क़रीब कस बेबसी से देख रही है क़ज़ा मुझे उन का बयान मेरी ज़बाँ पर जो आ गया लहजे ने उन के कर दिया क्या ख़ुश-नवा मुझे जिन को रही सदा मिरे मरने की आरज़ू जीने की दे रहे हैं वही अब दुआ मुझे जाने का वक़्त आया तो आई सदा-ए-हक़ मुद्दत से आरज़ू थी मिले हम-नवा मुझे हर बाम-ओ-दर से एक इशारा है रोज़-ओ-शब ने मैं वफ़ा को छोड़ सका ने वफ़ा मुझे दुनिया ने कितने मुझ को दिखाए हैं सब्ज़ बाग़ उन से न कोई कर सका लेकिन जुदा मुझे ख़ुश्बू से किस की महक रहे हैं मशाम-ए-जाँ दामन से दे रहा है कोई तो हवा मुझे तस्वीर उस के हाथ में लब पर मिरी ग़ज़ल देखा न एक आँख न जिस ने सुना मुझे फ़र्द-ए-अमल में मेरी हों शामिल सब उन के जौर उन के किए की शौक़ से दीजे सज़ा मुझे मेरी वफ़ा का उन को मिले हश्र में सिला मिल जाएँ उन के नाम के जौर-ओ-जफ़ा मुझे हर रोज़ मुझ को अपना बदलना पड़ा जवाब रोज़ इक सबक़ पढ़ाता है क़ासिद नया मुझे देखा तुम्हारी शक्ल में हुस्न-ए-अज़ल की ज़ौ सज्दा तुम्हारे दर पे हुआ है रवा मुझे झोंका कोई नसीम का 'गुलज़ार'-ए-नाज़ में उन का पयाम काश सुनाए सबा मुझे
Gulzar Dehlvi
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हम जो गुज़रे उन की महफ़िल के क़रीब इक कसक सी रह गई दल के क़रीब सब के सब बैठे थे क़ातिल के क़रीब बे-कसी थी सिर्फ़ बिस्मिल के क़रीब ज़िंदगी क्या थी अजब तूफ़ान थी अब कहीं पहुँचे हैं मंज़िल के क़रीब इस क़दर ख़ुद-रफ़्ता-ए-सहरा हुए भूल कर देखा न महमिल के क़रीब हाए उस मुख़्तार की मजबूरियाँ जिस ने दम तोड़ा हो मंज़िल के क़रीब ज़िंदगी-ओ-मौत वाहिद आइना आदमी है हद्द-ए-फ़ासिल के क़रीब ये तजाहुल आरिफ़ाना है जनाब भूल कर जाना न ग़ाफ़िल के क़रीब तर्बियत को हुस्न-ए-सोहबत चाहिए बैठिए उस्ताद-ए-कामिल के क़रीब होश की कहता है दीवाना सदा और मायूसी है आक़िल के क़रीब देखिए उन बद-नसीबों का मआल वो जो डूबे आ के साहिल के क़रीब छाई है 'गुलज़ार' में फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ फूल हैं सब गुल शमाइल के क़रीब
Gulzar Dehlvi
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उस सितमगर की मेहरबानी से दिल उलझता है ज़िंदगानी से ख़ाक से कितनी सूरतें उभरीं धुल गए नक़्श कितने पानी से हम से पूछो तो ज़ुल्म बेहतर है इन हसीनों की मेहरबानी से और भी क्या क़यामत आएगी पूछना है तिरी जवानी से दिल सुलगता है अश्क बहते हैं आग बुझती नहीं है पानी से हसरत-ए-उम्र-ए-जावेदाँ ले कर जा रहे हैं सरा-ए-फ़ानी से हाए क्या दौर-ए-ज़िंदगी गुज़रा वाक़िए हो गए कहानी से कितनी ख़ुश-फ़हमियों के बुत तोड़े तू ने गुलज़ार ख़ुश-बयानी से
Gulzar Dehlvi
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