हम जो गुज़रे उन की महफ़िल के क़रीब इक कसक सी रह गई दल के क़रीब सब के सब बैठे थे क़ातिल के क़रीब बे-कसी थी सिर्फ़ बिस्मिल के क़रीब ज़िंदगी क्या थी अजब तूफ़ान थी अब कहीं पहुँचे हैं मंज़िल के क़रीब इस क़दर ख़ुद-रफ़्ता-ए-सहरा हुए भूल कर देखा न महमिल के क़रीब हाए उस मुख़्तार की मजबूरियाँ जिस ने दम तोड़ा हो मंज़िल के क़रीब ज़िंदगी-ओ-मौत वाहिद आइना आदमी है हद्द-ए-फ़ासिल के क़रीब ये तजाहुल आरिफ़ाना है जनाब भूल कर जाना न ग़ाफ़िल के क़रीब तर्बियत को हुस्न-ए-सोहबत चाहिए बैठिए उस्ताद-ए-कामिल के क़रीब होश की कहता है दीवाना सदा और मायूसी है आक़िल के क़रीब देखिए उन बद-नसीबों का मआल वो जो डूबे आ के साहिल के क़रीब छाई है 'गुलज़ार' में फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ फूल हैं सब गुल शमाइल के क़रीब
Related Ghazal
मैं ने तो बस मज़ाक़ में पूछा ख़राब है? वो पीर हाथ देख के बोला ख़राब है हर दिन उसे दिखाया कि कितने शरीफ़ हैं हर रात उस के बारे में सोचा ख़राब है ये इश्क़ हो चुका है तुरुप-चाल ताश की आगे ग़ुलाम के मिरा इक्का ख़राब है आज़ाद लड़कियों से भली क़ैद औरतें मतलब कि झील ठीक है दरिया ख़राब है हम जिस ख़ुदा की आस में बैठे हैं रात दिन वो जा चुका है बोल के दुनिया ख़राब है ज़्यादा किसी की मौत पे रोना नहीं सही और जन्मदिन पे शोर शराबा ख़राब है आधा भी उस के जितना मैं रौशन नहीं हुआ मैं जिस दिए को बोल रहा था ख़राब है
Kushal Dauneria
35 likes
शैतान के दिल पर चलता हूँ सीनों में सफ़र करता हूँ उस आँख का क्या बचता है मैं जिस आँख में घर करता हूँ जो मुझ में उतरे हैं उन को मेरी लहरों का अंदाज़ा है दरियाओ में उठता बैठता हूँ सैलाब बसर करता हूँ मेरी तन्हाई का बोझ तुम्हारी बिनाई ले डूबेगा मुझे इतना क़रीब से मत देखो आँखों पर असर करता हूँ
Tehzeeb Hafi
63 likes
वही फिर मुझे याद आने लगे हैं जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं वो हैं पास और याद आने लगे हैं मोहब्बत के होश अब ठिकाने लगे हैं सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं हटाए थे जो राह से दोस्तों की वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं हवाएँ चलीं और न मौजें ही उट्ठीं अब ऐसे भी तूफ़ान आने लगे हैं क़यामत यक़ीनन क़रीब आ गई है 'ख़ुमार' अब तो मस्जिद में जाने लगे हैं
Khumar Barabankvi
16 likes
ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
232 likes
अश्क ज़ाया' हो रहे थे देख कर रोता न था जिस जगह बनता था रोना मैं उधर रोता न था सिर्फ़ तेरी चुप ने मेरे गाल गीले कर दिए मैं तो वो हूँ जो किसी की मौत पर रोता न था मुझ पे कितने सानिहे गुज़रे पर उन आँखों को क्या मेरा दुख ये हैं कि मेरा हम सफ़र रोता न था मैं ने उस के वस्ल में भी हिज्र काटा है कहीं वो मेरे काँधे पे रख लेता था सर रोता न था प्यार तो पहले भी उस सेे था मगर इतना नहीं तब मैं उस को छू तो लेता था मगर रोता न था गिर्या-ओ-ज़ारी को भी इक ख़ास मौसम चाहिए मेरी आँखें देख लो मैं वक़्त पर रोता न था
Tehzeeb Hafi
44 likes
More from Gulzar Dehlvi
पहले तो दाम-ए-ज़ुल्फ़ में उलझा लिया मुझे भूले से फिर कभी न दिलासा दिया मुझे क्या दर्दनाक मंज़र-ए-कश्ती था रूद में मैं ना-ख़ुदा को देख रहा था ख़ुदा मुझे बैठा हुआ है रश्क-ए-मसीहा मिरे क़रीब कस बेबसी से देख रही है क़ज़ा मुझे उन का बयान मेरी ज़बाँ पर जो आ गया लहजे ने उन के कर दिया क्या ख़ुश-नवा मुझे जिन को रही सदा मिरे मरने की आरज़ू जीने की दे रहे हैं वही अब दुआ मुझे जाने का वक़्त आया तो आई सदा-ए-हक़ मुद्दत से आरज़ू थी मिले हम-नवा मुझे हर बाम-ओ-दर से एक इशारा है रोज़-ओ-शब ने मैं वफ़ा को छोड़ सका ने वफ़ा मुझे दुनिया ने कितने मुझ को दिखाए हैं सब्ज़ बाग़ उन से न कोई कर सका लेकिन जुदा मुझे ख़ुश्बू से किस की महक रहे हैं मशाम-ए-जाँ दामन से दे रहा है कोई तो हवा मुझे तस्वीर उस के हाथ में लब पर मिरी ग़ज़ल देखा न एक आँख न जिस ने सुना मुझे फ़र्द-ए-अमल में मेरी हों शामिल सब उन के जौर उन के किए की शौक़ से दीजे सज़ा मुझे मेरी वफ़ा का उन को मिले हश्र में सिला मिल जाएँ उन के नाम के जौर-ओ-जफ़ा मुझे हर रोज़ मुझ को अपना बदलना पड़ा जवाब रोज़ इक सबक़ पढ़ाता है क़ासिद नया मुझे देखा तुम्हारी शक्ल में हुस्न-ए-अज़ल की ज़ौ सज्दा तुम्हारे दर पे हुआ है रवा मुझे झोंका कोई नसीम का 'गुलज़ार'-ए-नाज़ में उन का पयाम काश सुनाए सबा मुझे
Gulzar Dehlvi
1 likes
उस सितमगर की मेहरबानी से दिल उलझता है ज़िंदगानी से ख़ाक से कितनी सूरतें उभरीं धुल गए नक़्श कितने पानी से हम से पूछो तो ज़ुल्म बेहतर है इन हसीनों की मेहरबानी से और भी क्या क़यामत आएगी पूछना है तिरी जवानी से दिल सुलगता है अश्क बहते हैं आग बुझती नहीं है पानी से हसरत-ए-उम्र-ए-जावेदाँ ले कर जा रहे हैं सरा-ए-फ़ानी से हाए क्या दौर-ए-ज़िंदगी गुज़रा वाक़िए हो गए कहानी से कितनी ख़ुश-फ़हमियों के बुत तोड़े तू ने गुलज़ार ख़ुश-बयानी से
Gulzar Dehlvi
0 likes
अब तो सहरा में रहेंगे चल के दीवानों के साथ दहर में मुश्किल हुआ जीना जो फ़र्ज़ानों के साथ ख़त्म हो जाएँगे क़िस्से कल ये दीवानों के साथ फिर इन्हें दोहराओगे तुम कितने उनवानों के साथ बज़्म में हम को बुला कर आप उठ कर चल दिए क्या सुलूक-ए-नारवा जाएज़ है मेहमानों के साथ नफ़रतें फैला रहे हैं कैसी शैख़-ओ-बरहमन क्या शुमार इन का करेंगे आप इंसानों के साथ उन की आँखों की गुलाबी से जो हम मख़मूर हैं इक तअ'ल्लुक़ है क़दीमी हम को पैमानों के साथ हर तरफ़ कू-ए-बुताँ में हसरतों का है हुजूम एक दिल लाए थे हम तो अपना अरमानों के साथ कल तलक दानाओं की सोहबत में थे सब के इमाम आज कैसे सुस्त हैं यूँँ शैख़ नादानों के साथ उन की आँखें इक तरफ़ ये जाम-ओ-मीना इक तरफ़ किस तरह गर्दिश में हैं पैमाने पैमानों के साथ आशिक़ों के दिल में शब फ़ानूस रौशन हो गए शम्अ''' का जीना है लाज़िम अपने परवानों के साथ हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में गुल यगाने हो गए लहलहा कर अब रहेगा सब्ज़ा बेगानों के साथ
Gulzar Dehlvi
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Gulzar Dehlvi.
Similar Moods
More moods that pair well with Gulzar Dehlvi's ghazal.







