ghazalKuch Alfaaz

पहले तो दाम-ए-ज़ुल्फ़ में उलझा लिया मुझे भूले से फिर कभी न दिलासा दिया मुझे क्या दर्दनाक मंज़र-ए-कश्ती था रूद में मैं ना-ख़ुदा को देख रहा था ख़ुदा मुझे बैठा हुआ है रश्क-ए-मसीहा मिरे क़रीब कस बेबसी से देख रही है क़ज़ा मुझे उन का बयान मेरी ज़बाँ पर जो आ गया लहजे ने उन के कर दिया क्या ख़ुश-नवा मुझे जिन को रही सदा मिरे मरने की आरज़ू जीने की दे रहे हैं वही अब दुआ मुझे जाने का वक़्त आया तो आई सदा-ए-हक़ मुद्दत से आरज़ू थी मिले हम-नवा मुझे हर बाम-ओ-दर से एक इशारा है रोज़-ओ-शब ने मैं वफ़ा को छोड़ सका ने वफ़ा मुझे दुनिया ने कितने मुझ को दिखाए हैं सब्ज़ बाग़ उन से न कोई कर सका लेकिन जुदा मुझे ख़ुश्बू से किस की महक रहे हैं मशाम-ए-जाँ दामन से दे रहा है कोई तो हवा मुझे तस्वीर उस के हाथ में लब पर मिरी ग़ज़ल देखा न एक आँख न जिस ने सुना मुझे फ़र्द-ए-अमल में मेरी हों शामिल सब उन के जौर उन के किए की शौक़ से दीजे सज़ा मुझे मेरी वफ़ा का उन को मिले हश्र में सिला मिल जाएँ उन के नाम के जौर-ओ-जफ़ा मुझे हर रोज़ मुझ को अपना बदलना पड़ा जवाब रोज़ इक सबक़ पढ़ाता है क़ासिद नया मुझे देखा तुम्हारी शक्ल में हुस्न-ए-अज़ल की ज़ौ सज्दा तुम्हारे दर पे हुआ है रवा मुझे झोंका कोई नसीम का 'गुलज़ार'-ए-नाज़ में उन का पयाम काश सुनाए सबा मुझे

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है

Jaun Elia

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जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़ उस का कमरा एक तरफ़ है बाक़ी दुनिया एक तरफ़ मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ुद को बाँटा है बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़ एक तरफ़ मुझे जल्दी है उस के दिल में घर करने की एक तरफ़ वो कर देता है रफ़्ता रफ़्ता एक तरफ़ यूँँ तो आज भी तेरा दुख दिल दहला देता है लेकिन तुझ से जुदा होने के बा'द का पहला हफ़्ता एक तरफ़ उस की आँखों ने मुझ सेे मेरी ख़ुद्दारी छीनी वरना पाँव की ठोकर से कर देता था मैं दुनिया एक तरफ़ मेरी मर्ज़ी थी मैं ज़र्रे चुनता या लहरें चुनता उस ने सहरा एक तरफ़ रक्खा और दरिया एक तरफ़

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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हम जो गुज़रे उन की महफ़िल के क़रीब इक कसक सी रह गई दल के क़रीब सब के सब बैठे थे क़ातिल के क़रीब बे-कसी थी सिर्फ़ बिस्मिल के क़रीब ज़िंदगी क्या थी अजब तूफ़ान थी अब कहीं पहुँचे हैं मंज़िल के क़रीब इस क़दर ख़ुद-रफ़्ता-ए-सहरा हुए भूल कर देखा न महमिल के क़रीब हाए उस मुख़्तार की मजबूरियाँ जिस ने दम तोड़ा हो मंज़िल के क़रीब ज़िंदगी-ओ-मौत वाहिद आइना आदमी है हद्द-ए-फ़ासिल के क़रीब ये तजाहुल आरिफ़ाना है जनाब भूल कर जाना न ग़ाफ़िल के क़रीब तर्बियत को हुस्न-ए-सोहबत चाहिए बैठिए उस्ताद-ए-कामिल के क़रीब होश की कहता है दीवाना सदा और मायूसी है आक़िल के क़रीब देखिए उन बद-नसीबों का मआल वो जो डूबे आ के साहिल के क़रीब छाई है 'गुलज़ार' में फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ फूल हैं सब गुल शमाइल के क़रीब

Gulzar Dehlvi

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उस सितमगर की मेहरबानी से दिल उलझता है ज़िंदगानी से ख़ाक से कितनी सूरतें उभरीं धुल गए नक़्श कितने पानी से हम से पूछो तो ज़ुल्म बेहतर है इन हसीनों की मेहरबानी से और भी क्या क़यामत आएगी पूछना है तिरी जवानी से दिल सुलगता है अश्क बहते हैं आग बुझती नहीं है पानी से हसरत-ए-उम्र-ए-जावेदाँ ले कर जा रहे हैं सरा-ए-फ़ानी से हाए क्या दौर-ए-ज़िंदगी गुज़रा वाक़िए हो गए कहानी से कितनी ख़ुश-फ़हमियों के बुत तोड़े तू ने गुलज़ार ख़ुश-बयानी से

Gulzar Dehlvi

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अब तो सहरा में रहेंगे चल के दीवानों के साथ दहर में मुश्किल हुआ जीना जो फ़र्ज़ानों के साथ ख़त्म हो जाएँगे क़िस्से कल ये दीवानों के साथ फिर इन्हें दोहराओगे तुम कितने उनवानों के साथ बज़्म में हम को बुला कर आप उठ कर चल दिए क्या सुलूक-ए-नारवा जाएज़ है मेहमानों के साथ नफ़रतें फैला रहे हैं कैसी शैख़-ओ-बरहमन क्या शुमार इन का करेंगे आप इंसानों के साथ उन की आँखों की गुलाबी से जो हम मख़मूर हैं इक तअ'ल्लुक़ है क़दीमी हम को पैमानों के साथ हर तरफ़ कू-ए-बुताँ में हसरतों का है हुजूम एक दिल लाए थे हम तो अपना अरमानों के साथ कल तलक दानाओं की सोहबत में थे सब के इमाम आज कैसे सुस्त हैं यूँँ शैख़ नादानों के साथ उन की आँखें इक तरफ़ ये जाम-ओ-मीना इक तरफ़ किस तरह गर्दिश में हैं पैमाने पैमानों के साथ आशिक़ों के दिल में शब फ़ानूस रौशन हो गए शम्अ''' का जीना है लाज़िम अपने परवानों के साथ हैफ़ गुलज़ार-ए-जहाँ में गुल यगाने हो गए लहलहा कर अब रहेगा सब्ज़ा बेगानों के साथ

Gulzar Dehlvi

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