ghazalKuch Alfaaz

ओ दिल तोड़ के जाने वाले दिल की बात बताता जा अब मैं दिल को क्या समझाऊँ मुझ को भी समझाता जा हाँ मेरे मजरूह तबस्सुम ख़ुश्क लबों तक आता जा फूल की हस्त-ओ-बूद यही है खिलता जा मुरझाता जा मेरी चुप रहने की आदत जिस कारन बद-नाम हुई अब वो हिकायत आम हुई है सुनता जा शरमाता जा ये दुख-दर्द की बरखा बंदे देन है तेरे दाता की शुक्र-ए-नेमत भी करता जा दामन भी फैलाता जा जीने का अरमान करूँँ या मरने का सामान करूँँ इश्क़ में क्या होता है नासेह अक़्ल की बात सुझाता जा तुझ को अब्र-आलूद दिनों से काम न चाँदनी रातों से बहलाता है बातों से बहलाता जा बहलाता जा दोनों संग-ए-राह-ए-तलब हैं राह-नुमा भी मंज़िल भी ज़ौक़-ए-तलब हर एक क़दम पर दोनों को ठुकराता जा नग़्में से जब फूल खिलेंगे चुनने वाले चुन लेंगे सुनने वाले सुन लेंगे तू अपनी धुन में गाता जा आख़िर तुझ को भी मौत आई ख़ैर 'हफ़ीज़' ख़ुदा-हाफ़िज़ लेकिन मरते मरते प्यारे वज्ह-ए-मर्ग बताता जा

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो सरकारी एलान हुआ है सच बोलो घर के अंदर तो झूठों की एक मंडी है दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो गुलदस्ते पर यकजहती लिख रक्खा है गुलदस्ते के अंदर क्या है सच बोलो गंगा मइया डूबने वाले अपने थे नाव में किस ने छेद किया है सच बोलो

Rahat Indori

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं जब भी चाहूँ इक जहाँ आबाद कर लेता हूँ मैं मुझ को इन मजबूरियों पर भी है इतना इख़्तियार आह भर लेता हूँ मैं फ़रियाद कर लेता हूँ मैं हुस्न बे-चारा तो हो जाता है अक्सर मेहरबाँ फिर उसे आमादा-ए-बे-दाद कर लेता हूँ मैं तू नहीं कहता मगर देख ओ वफ़ा-ना-आश्ना अपनी हस्ती किस क़दर बर्बाद कर लेता हूँ मैं हाँ ये वीराना ये दिल ये आरज़ूओं का मज़ार तुम कहो तो फिर इसे आबाद कर लेता हूँ मैं जब कोई ताज़ा मुसीबत टूटती है ऐ 'हफ़ीज़' एक आदत है ख़ुदा को याद कर लेता हूँ मैं

Hafeez Jalandhari

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हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके तुम ने हमें भुला दिया हम न तुम्हें भुला सके तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके होश में आ चुके थे हम जोश में आ चुके थे हम बज़्म का रंग देख कर सर न मगर उठा सके रौनक़-ए-बज़्म बन गए लब पे हिकायतें रहीं दिल में शिकायतें रहीं लब न मगर हिला सके शौक़-ए-विसाल है यहाँ लब पे सवाल है यहाँ किस की मजाल है यहाँ हम से नज़र मिला सके ऐसा हो कोई नामा-बर बात पे कान धर सके सुन के यक़ीन कर सके जा के उन्हें सुना सके इज्ज़ से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज-ए-दोस्त अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके अहल-ए-ज़बाँ तो हैं बहुत कोई नहीं है अहल-ए-दिल कौन तिरी तरह 'हफ़ीज़' दर्द के गीत गा सके

Hafeez Jalandhari

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ये मुलाक़ात मुलाक़ात नहीं होती है बात होती है मगर बात नहीं होती है बारयाबी का बुरा हो कि अब उन के दर पर अगले वक़्तों की मुदारात नहीं होती है ग़म तो घनघोर घटाओं की तरह उठते हैं ज़ब्त का दश्त है बरसात नहीं होती है ये मिरा तजरबा है हुस्न कोई चाल चले बाज़ी-ए-इश्क़ कभी मात नहीं होती है वस्ल है नाम हम-आहंगी ओ यक-रंगी का वस्ल में कोई बुरी बात नहीं होती है हिज्र तंहाई है सूरज है सवा नेज़े पर दिन ही रहता है यहाँ रात नहीं होती है ज़ब्त-ए-गिर्या कभी करता हूँ तो फ़रमाते हैं आज क्या बात है बरसात नहीं होती है मुझे अल्लाह की क़सम शे'र में तहसीन-ए-बुताँ मैं जो करता हूँ मेरी ज़ात नहीं होती है फ़िक्र-ए-तख़्लीक़-ए-सुख़न मसनद-ए-राहत पे हफ़ीज़ बाइस-ए-कश्फ़-ओ-करामात नहीं होती है

Hafeez Jalandhari

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आने वाले जाने वाले हर ज़माने के लिए आदमी मज़दूर है राहें बनाने के लिए ज़िंदगी फ़िरदौस-ए-गुम-गश्ता को पा सकती नहीं मौत ही आती है ये मंज़िल दिखाने के लिए मेरी पेशानी पे इक सज्दा तो है लिक्खा हुआ ये नहीं मालूम है किस आस्ताने के लिए उन का व'अदा और मुझे उस पर यक़ीं ऐ हम-नशीं इक बहाना है तड़पने तिलमिलाने के लिए जब से पहरा ज़ब्त का है आँसुओं की फ़स्ल पर हो गईं मुहताज आँखें दाने दाने के लिए आख़िरी उम्मीद वक़्त-ए-नज़अ उन की दीद थी मौत को भी मिल गया फ़िक़रा न आने के लिए अल्लाह अल्लाह दोस्त को मेरी तबाही पर ये नाज़ सू-ए-दुश्मन देखता है दाद पाने के लिए नेमत-ए-ग़म मेरा हिस्सा मुझ को दे दे ऐ ख़ुदा जम'अ रख मेरी ख़ुशी सारे ज़माने के लिए नुस्ख़ा-ए-हस्ती में इबरत के सिवा क्या था 'हफ़ीज़' सुर्ख़ियाँ कुछ मिल गईं अपने फ़साने के लिए

Hafeez Jalandhari

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हुस्न ने सीखीं ग़रीब-आज़ारियाँ इश्क़ की मजबूरियाँ लाचारियाँ बह गया दिल हसरतों के ख़ून में ले गईं बीमार को बीमारियाँ सोच कर ग़म दीजिए ऐसा न हो आप को करनी पड़ें ग़म-ख़्वारियाँ दार के क़दमों में भी पहुँची न अक़्ल इश्क़ ही के सर रहीं सरदारियाँ इक तरफ़ जिंस-ए-वफ़ा क़ीमत-तबल इक तरफ़ मैं और मिरी नादारियाँ होते होते जान दूभर हो गई बढ़ते बढ़ते बढ़ गईं बे-ज़ारियाँ तुम ने दुनिया ही बदल डाली मिरी अब तो रहने दो ये दुनिया-दारियाँ

Hafeez Jalandhari

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