अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे कौन होगा जो मुझे उस की तरह याद करे दिल अजब शहर कि जिस पर भी खुला दर इस का वो मुसाफ़िर इसे हर सम्त से बर्बाद करे अपने क़ातिल की ज़ेहानत से परेशान हूँ मैं रोज़ इक मौत नए तर्ज़ की ईजाद करे इतना हैराँ हो मिरी बे-तलबी के आगे वा क़फ़स में कोई दर ख़ुद मिरा सय्याद करे सल्ब-ए-बीनाई के अहकाम मिले हैं जो कभी रौशनी छूने की ख़्वाहिश कोई शब-ज़ाद करे सोच रखना भी जराएम में है शामिल अब तो वही मासूम है हर बात पे जो साद करे जब लहू बोल पड़े उस के गवाहों के ख़िलाफ़ क़ाज़ी-ए-शहर कुछ इस बाब में इरशाद करे उस की मुट्ठी में बहुत रोज़ रहा मेरा वजूद मेरे साहिर से कहो अब मुझे आज़ाद करे
Related Ghazal
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
अपनी आँखों में भर कर ले जाने हैं मुझ को उस के आँसू काम में लाने है देखो हम कोई वहशी नइँ दीवाने हैं तुम सेे बटन खुलवाने नइँ लगवाने हैं हम तुम इक दूजे की सीढ़ी है जानाँ बाक़ी दुनिया तो साँपों के ख़ाने हैं पाक़ीज़ा चीज़ों को पाक़ीज़ा लिखो मत लिक्खो उस की आँखें मय-ख़ाने हैं
Varun Anand
63 likes
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
465 likes
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
526 likes
ग़म की दौलत मुफ़्त लुटा दूँ बिल्कुल नहीं अश्कों में ये दर्द बहा दूँ बिल्कुल नहीं तू ने तो औक़ात दिखा दी है अपनी मैं अपना मेआ'र गिरा दूँ बिल्कुल नहीं एक नजूमी सब को ख़्वाब दिखाता है मैं भी अपना हाथ दिखा दूँ बिल्कुल नहीं मेरे अंदर इक ख़ामोशी चीख़ती है तो क्या मैं भी शोर मचा दूँ बिल्कुल नहीं
Mehshar Afridi
49 likes
More from Parveen Shakir
अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ इक ज़रा शे'र कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ नींद आ जाए तो क्या महफ़िलें बरपा देखूँ आँख खुल जाए तो तन्हाई का सहरा देखूँ शाम भी हो गई धुँदला गईं आँखें भी मिरी भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ एक इक कर के मुझे छोड़ गईं सब सखियाँ आज मैं ख़ुद को तिरी याद में तन्हा देखूँ काश संदल से मिरी माँग उजाले आ कर इतने ग़ैरों में वही हाथ जो अपना देखूँ तू मिरा कुछ नहीं लगता है मगर जान-ए-हयात जाने क्यूँँ तेरे लिए दिल को धड़कना देखूँ बंद कर के मिरी आँखें वो शरारत से हँसे बूझे जाने का मैं हर रोज़ तमाशा देखूँ सब ज़िदें उस की मैं पूरी करूँँ हर बात सुनूँ एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ मुझ पे छा जाए वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह अंग अंग अपना इसी रुत में महकता देखूँ फूल की तरह मिरे जिस्म का हर लब खुल जाए पंखुड़ी पंखुड़ी उन होंटों का साया देखूँ मैं ने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस इक बार ख़्वाब बन कर तिरी आँखों में उतरता देखूँ तू मिरी तरह से यकता है मगर मेरे हबीब जी में आता है कोई और भी तुझ सा देखूँ टूट जाएँ कि पिघल जाएँ मिरे कच्चे घड़े तुझ को मैं देखूँ कि ये आग का दरिया देखूँ
Parveen Shakir
2 likes
अब इतनी सादगी लाएँ कहाँ से ज़मीं की ख़ैर माँगे आसमाँ से अगर चाहें तो वो दीवार कर दें हमें अब कुछ नहीं कहना ज़बाँ से सितारा ही नहीं जब साथ देता तो कश्ती काम ले क्या बादबाँ से भटकने से मिले फ़ुर्सत तो पूछें पता मंज़िल का मीर-ए-कारवाँ से तवज्जोह बर्क़ की हासिल रही है सो है आज़ाद फ़िक्र-ए-आशियाँ से हवा को राज़-दाँ हम ने बनाया और अब नाराज़ ख़ुशबू के बयाँ से ज़रूरी हो गई है दिल की ज़ीनत मकीं पहचाने जाते हैं मकाँ से फ़ना-फ़िल-इश्क़ होना चाहते थे मगर फ़ुर्सत न थी कार-ए-जहाँ से वगर्ना फ़स्ल-ए-गुल की क़द्र क्या थी बड़ी हिकमत है वाबस्ता ख़िज़ाँ से किसी ने बात की थी हँस के शायद ज़माने भर से हैं हम ख़ुद गुमाँ से मैं इक इक तीर पे ख़ुद ढाल बनती अगर होता वो दुश्मन की कमाँ से जो सब्ज़ा देख कर ख़े में लगाएँ उन्हें तकलीफ़ क्यूँँ पहुँचे ख़िज़ाँ से जो अपने पेड़ जलते छोड़ जाएँ उन्हें क्या हक़ कि रूठें बाग़बाँ से
Parveen Shakir
0 likes
तराश कर मेरे बाज़ू उड़ान छोड़ गया हवा के पास बरहना कमान छोड़ गया रफ़ाक़तों का मेरी उस को ध्यान कितना था ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया अजीब शख़्स था बारिश का रंग देख के भी खुले दरीचे पे इक फूल-दान छोड़ गया जो बादलों से भी मुझ को छुपाए रखता था बढ़ी है धूप तो बे-साएबान छोड़ गया निकल गया कहीं अन-देखे पानियों की तरफ़ ज़मीं के नाम खुला बादबान छोड़ गया उक़ाब को थी ग़रज़ फ़ाख़्ता पकड़ने से जो गिर गई तो यूँँही नीम-जान छोड़ गया न जाने कौन सा आसेब दिल में बस्ता है कि जो भी ठहरा वो आख़िर मकान छोड़ गया अक़ब में गहरा समुंदर है सामने जंगल किस इंतिहा पे मेरा मेहरबान छोड़ गया
Parveen Shakir
5 likes
गवाही कैसे टूटती मुआ'मला ख़ुदा का था मिरा और उस का राब्ता तो हाथ और दुआ का था गुलाब क़ीमत-ए-शगुफ़्त शाम तक चुका सके अदा वो धूप को हुआ जो क़र्ज़ भी सबा का था बिखर गया है फूल तो हमीं से पूछ-गछ हुई हिसाब बाग़बाँ से है किया-धरा हवा का था लहू-चशीदा हाथ उस ने चूम कर दिखा दिया जज़ा वहाँ मिली जहाँ कि मरहला सज़ा का था जो बारिशों से क़ब्ल अपना रिज़्क़ घर में भर चुका वो शहर-ए-मोर से न था प दूरबीं बला का था
Parveen Shakir
2 likes
धनक धनक मिरी पोरों के ख़्वाब कर देगा वो लम्स मेरे बदन को गुलाब कर देगा क़बा-ए-जिस्म के हर तार से गुज़रता हुआ किरन का प्यार मुझे आफ़्ताब कर देगा जुनूँ-पसंद है दिल और तुझ तक आने में बदन को नाव लहू को चनाब कर देगा मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा अना-परस्त है इतना कि बात से पहले वो उठ के बंद मिरी हर किताब कर देगा सुकूत-ए-शहर-ए-सुख़न में वो फूल सा लहजा समाअ'तों की फ़ज़ा ख़्वाब ख़्वाब कर देगा इसी तरह से अगर चाहता रहा पैहम सुख़न-वरी में मुझे इंतिख़ाब कर देगा मिरी तरह से कोई है जो ज़िंदगी अपनी तुम्हारी याद के नाम इंतिसाब कर देगा
Parveen Shakir
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Parveen Shakir.
Similar Moods
More moods that pair well with Parveen Shakir's ghazal.







