ghazalKuch Alfaaz

धनक धनक मिरी पोरों के ख़्वाब कर देगा वो लम्स मेरे बदन को गुलाब कर देगा क़बा-ए-जिस्म के हर तार से गुज़रता हुआ किरन का प्यार मुझे आफ़्ताब कर देगा जुनूँ-पसंद है दिल और तुझ तक आने में बदन को नाव लहू को चनाब कर देगा मैं सच कहूँगी मगर फिर भी हार जाऊँगी वो झूट बोलेगा और ला-जवाब कर देगा अना-परस्त है इतना कि बात से पहले वो उठ के बंद मिरी हर किताब कर देगा सुकूत-ए-शहर-ए-सुख़न में वो फूल सा लहजा समाअ'तों की फ़ज़ा ख़्वाब ख़्वाब कर देगा इसी तरह से अगर चाहता रहा पैहम सुख़न-वरी में मुझे इंतिख़ाब कर देगा मिरी तरह से कोई है जो ज़िंदगी अपनी तुम्हारी याद के नाम इंतिसाब कर देगा

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ग़म की दौलत मुफ़्त लुटा दूँ बिल्कुल नहीं अश्कों में ये दर्द बहा दूँ बिल्कुल नहीं तू ने तो औक़ात दिखा दी है अपनी मैं अपना मेआ'र गिरा दूँ बिल्कुल नहीं एक नजूमी सब को ख़्वाब दिखाता है मैं भी अपना हाथ दिखा दूँ बिल्कुल नहीं मेरे अंदर इक ख़ामोशी चीख़ती है तो क्या मैं भी शोर मचा दूँ बिल्कुल नहीं

Mehshar Afridi

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बे-सबब उस के नाम की मैं ने काट तो ली थी ज़िंदगी मैं ने वो मुझे ख़्वाब में नज़र आया और तस्वीर खींच ली मैं ने आप का काम हो गया आक़ा लाश दरिया में फेंक दी मैं ने खेल तू इस लिए भी हारेगा चाल चलनी है आख़िरी मैं ने एक वो बे-हिजाब और उस पर डाल रक्खी थी रौशनी मैं ने

Zia Mazkoor

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सूरज, सितारे चाँद मेरे साथ में रहे जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे साँसों की तरह साथ रहे सारी ज़िंदगी तुम ख़्वाब से गए तो ख़यालात में रहे हर बूँद तीर बन के उतरती है रूह में तन्हा मेरी तरह कोई बरसात में रहे हर रंग हर मिज़ाज में पाया है आप को मौसम तमाम आप की ख़िदमत में रहे शाखों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे के औक़ात में रहे

Rahat Indori

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टूटने पर कोई आए तो फिर ऐसा टूटे कि जिसे देख के हर देखने वाला टूटे अपने बिखरे हुए टुकड़ों को समेटे कब तक एक इंसान की ख़ातिर कोई कितना टूटे कोई टुकड़ा तेरी आँखों में न चुभ जाए कहीं दूर हो जा कि मेरे ख़्वाब का शीशा टूटे मैं किसी और को सोचूँ तो मुझे होश आए मैं किसी और को देखूँ तो ये नश्शा टूटे रंज होता है तो ऐसा कि बताए न बने जब किसी अपने के बाइ'से कोई अपना टूटे पास बैठे हुए यारों को ख़बर तक न हुई हम किसी बात पे इस दर्जा अनोखा टूटे इतनी जल्दी तो सँभलने की तवक़्क़ो' न करो वक़्त ही कितना हुआ है मेरा सपना टूटे दाद की भीक न माँग ऐ मेरे अच्छे शाएर जा तुझे मेरी दुआ है तेरा कासा टूटे तू उसे किस के भरोसे पे नहीं कात रही चर्ख़ को देखने वाली तेरा चर्ख़ा टूटे वर्ना कब तक लिए फिरता रहूँ उस को 'जव्वाद' कोई सूरत हो कि उम्मीद से रिश्ता टूटे

Jawwad Sheikh

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ इक ज़रा शे'र कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ नींद आ जाए तो क्या महफ़िलें बरपा देखूँ आँख खुल जाए तो तन्हाई का सहरा देखूँ शाम भी हो गई धुँदला गईं आँखें भी मिरी भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ एक इक कर के मुझे छोड़ गईं सब सखियाँ आज मैं ख़ुद को तिरी याद में तन्हा देखूँ काश संदल से मिरी माँग उजाले आ कर इतने ग़ैरों में वही हाथ जो अपना देखूँ तू मिरा कुछ नहीं लगता है मगर जान-ए-हयात जाने क्यूँँ तेरे लिए दिल को धड़कना देखूँ बंद कर के मिरी आँखें वो शरारत से हँसे बूझे जाने का मैं हर रोज़ तमाशा देखूँ सब ज़िदें उस की मैं पूरी करूँँ हर बात सुनूँ एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ मुझ पे छा जाए वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह अंग अंग अपना इसी रुत में महकता देखूँ फूल की तरह मिरे जिस्म का हर लब खुल जाए पंखुड़ी पंखुड़ी उन होंटों का साया देखूँ मैं ने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस इक बार ख़्वाब बन कर तिरी आँखों में उतरता देखूँ तू मिरी तरह से यकता है मगर मेरे हबीब जी में आता है कोई और भी तुझ सा देखूँ टूट जाएँ कि पिघल जाएँ मिरे कच्चे घड़े तुझ को मैं देखूँ कि ये आग का दरिया देखूँ

Parveen Shakir

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अब इतनी सादगी लाएँ कहाँ से ज़मीं की ख़ैर माँगे आसमाँ से अगर चाहें तो वो दीवार कर दें हमें अब कुछ नहीं कहना ज़बाँ से सितारा ही नहीं जब साथ देता तो कश्ती काम ले क्या बादबाँ से भटकने से मिले फ़ुर्सत तो पूछें पता मंज़िल का मीर-ए-कारवाँ से तवज्जोह बर्क़ की हासिल रही है सो है आज़ाद फ़िक्र-ए-आशियाँ से हवा को राज़-दाँ हम ने बनाया और अब नाराज़ ख़ुशबू के बयाँ से ज़रूरी हो गई है दिल की ज़ीनत मकीं पहचाने जाते हैं मकाँ से फ़ना-फ़िल-इश्क़ होना चाहते थे मगर फ़ुर्सत न थी कार-ए-जहाँ से वगर्ना फ़स्ल-ए-गुल की क़द्र क्या थी बड़ी हिकमत है वाबस्ता ख़िज़ाँ से किसी ने बात की थी हँस के शायद ज़माने भर से हैं हम ख़ुद गुमाँ से मैं इक इक तीर पे ख़ुद ढाल बनती अगर होता वो दुश्मन की कमाँ से जो सब्ज़ा देख कर ख़े में लगाएँ उन्हें तकलीफ़ क्यूँँ पहुँचे ख़िज़ाँ से जो अपने पेड़ जलते छोड़ जाएँ उन्हें क्या हक़ कि रूठें बाग़बाँ से

Parveen Shakir

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दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है तिरी जुदाई का मंज़र अभी निगाह में है तिरे बदलने के बा-वस्फ़ तुझ को चाहा है ये ए'तिराफ़ भी शामिल मिरे गुनाह में है अज़ाब देगा तो फिर मुझ को ख़्वाब भी देगा मैं मुतमइन हूँ मिरा दिल तिरी पनाह में है बिखर चुका है मगर मुस्कुरा के मिलता है वो रख रखाव अभी मेरे कज-कुलाह में है जिसे बहार के मेहमान ख़ाली छोड़ गए वो इक मकान अभी तक मकीं की चाह में है यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था हमारी साल-गिरह ठीक अब के माह में है मैं बच भी जाऊँ तो तन्हाई मार डालेगी मिरे क़बीले का हर फ़र्द क़त्ल-गाह में है

Parveen Shakir

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अश्क आँख में फिर अटक रहा है कंकर सा कोई खटक रहा है मैं उस के ख़याल से गुरेज़ाँ वो मेरी सदा झटक रहा है तहरीर उसी की है मगर दिल ख़त पढ़ते हुए अटक रहा है हैं फ़ोन पे किस के साथ बातें और ज़ेहन कहाँ भटक रहा है सदियों से सफ़र में है समुंदर साहिल पे थकन टपक रहा है इक चाँद सलीब-ए-शाख़-ए-गुल पर बाली की तरह लटक रहा है

Parveen Shakir

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तराश कर मेरे बाज़ू उड़ान छोड़ गया हवा के पास बरहना कमान छोड़ गया रफ़ाक़तों का मेरी उस को ध्यान कितना था ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया अजीब शख़्स था बारिश का रंग देख के भी खुले दरीचे पे इक फूल-दान छोड़ गया जो बादलों से भी मुझ को छुपाए रखता था बढ़ी है धूप तो बे-साएबान छोड़ गया निकल गया कहीं अन-देखे पानियों की तरफ़ ज़मीं के नाम खुला बादबान छोड़ गया उक़ाब को थी ग़रज़ फ़ाख़्ता पकड़ने से जो गिर गई तो यूँँही नीम-जान छोड़ गया न जाने कौन सा आसेब दिल में बस्ता है कि जो भी ठहरा वो आख़िर मकान छोड़ गया अक़ब में गहरा समुंदर है सामने जंगल किस इंतिहा पे मेरा मेहरबान छोड़ गया

Parveen Shakir

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