बात ऐसी है नहीं वो बात ही करता नहीं जब हमें होती ज़रूरत बस तभी करता नहीं बाप बच्चों के लिए जादूगरी करता नहीं बस मुसलसल काम करने में कमी करता नहीं किस क़दर उस को सताया है ख़ुदा ने इश्क़ में जो नहीं काफ़िर है फिर भी बंदगी करता नहीं सोचता हूँ हिज्र कैसे काटता होगा 'तनोज' शे'र जो कहता नहीं और मैक़शी करता नहीं
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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तड़पता ही नहीं इतना अगर शाइ'र नहीं होता तड़पना क्या? मैं ख़ुश रहता अगर शाइ'र नहीं होता कभी सुनता नहीं इस को ज़माना ग़ौर से यारों अहम किरदार क़िस्से का अगर शाइ'र नहीं होता मुझे सबकी मोहब्बत ने बनाया एक ऑटोग्राफ़ मैं सिग्नेचर ही रह जाता अगर शाइ'र नहीं होता ख़ुदा की रहमतों से मैं मेरी ग़ज़लों का मालिक हूँ कहीं नौकर बना होता अगर शाइ'र नहीं होता मुझे भी घेर लेती फिर किसी दिन मज़हबी बातें सियासत में चला जाता अगर शाइ'र नहीं होता 'नवा', 'ग़ाफ़िल', 'चराग़', 'आशू', 'वरुन आनन्द' और 'ताबिश' 'तनोज' इनसे नहीं मिलता अगर शाइ'र नहीं होता
Tanoj Dadhich
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एक भयानक तूफ़ाँ आया पूरा छप्पर उड़ा दिया लेकिन फिर मेरी हिम्मत ने सारा मंज़र उड़ा दिया जितना पैसा लाई थी वो हफ़्तों तक बर्तन धोके उस के शौहर ने इक दिन में दारू पी कर उड़ा दिया हार गए जब दुनिया के सब वीर बहादुर और राजा इक लड़के ने धनुष उठाया और स्वयंवर उड़ा दिया हैरानी से दंग हुए तब जादू देख रहे सब लोग एक कबूतर ने ग़ुस्से में जब जादूगर उड़ा दिया डूब चुके थे उस की आँखों में हम इतने, मत पूछो क्या बतलाएँ चिड़िया उड़ में हम ने बन्दर उड़ा दिया
Tanoj Dadhich
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डरता नहीं हूँ मैं किसी भी इम्तिहान से दूँगा सभी जवाब मगर इत्मीनान से लौट आती है सदा यूँँ मेरे जिस्म से मेरी जैसे कि लौट आई हो ख़ाली मकान से उस ने लिया गुलाब मगर कुछ नहीं कहा निकला नहीं है तीर अभी भी कमान से लंकेश को हराया था सीता बचाई थी बनता था घर को लौटना पुष्पक विमान से ख़ुद का ही आसमान है काफ़ी 'तनोज' को जलता नहीं वो और किसी की उड़ान से
Tanoj Dadhich
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चमचमाती कार में उस की बिदाई हो गई पर यक़ीन आता नहीं है बेवफ़ाई हो गई पार्क में सब दोस्त मेरे राह देखें हैं मेरी अब तो जाने दो मुझे अब तो पढ़ाई हो गई आदमी को और बच्चों को पता चलता नहीं रोटी सब्ज़ी कब बनी और कब सफ़ाई हो गई आओ बैठो अब सुनो तारीफ़ मेरी दोस्तों जिस ने छोड़ा है मुझे उस की बुराई हो गई आख़री चोटी से गिरकर हम मरे हैं इश्क़ की हम समझते थे हिमालय की चढ़ाई हो गई
Tanoj Dadhich
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कल उस की आरती मैं ने उतारी मगर मत पूछना कैसे उतारी गले तक आ गई थी बात मेरे सो पानी पी लिया, नीचे उतारी उसे भी मौत ने कुछ दिन पुकारा वो जिस ने लाश पंखे से उतारी
Tanoj Dadhich
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