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बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए मैं ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाएँ लोग मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद हो मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाइए मुझे मैं नींद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए सच बात कौन है जो सर-ए-आम कह सके मैं कह रहा हूँ मुझ को सज़ा देनी चाहिए

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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शजर हैं अब समर-आसार मेरे चले आते हैं दावेदार मेरे मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं समुंदर हैं समुंदर पार मेरे अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें अगर चाहें तो ये बीमार मेरे हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन गए बेकार सारे वार मेरे मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे हँसी में टाल देना था मुझे भी ख़ता क्यूँँ हो गए सरकार मेरे तसव्वुर में न जाने कौन आया महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे तुम्हारा नाम दुनिया जानती है बहुत रुस्वा हैं अब अश'आर मेरे भँवर में रुक गई है नाव मेरी किनारे रह गए इस पार मेरे मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे

Rahat Indori

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ज़िंदगी की हर कहानी बे-असर हो जाएगी हम न होंगे तो ये दुनिया दर-ब-दर हो जाएगी पावँ पत्थर कर के छोड़ेगी अगर रुक जाइए चलते रहिए तो ज़मीं भी हम-सफ़र हो जाएगी जुगनुओं को साथ ले कर रात रौशन कीजिए रास्ता सूरज का देखा तो सहर हो जाएगी ज़िंदगी भी काश मेरे साथ रहती उम्र-भर ख़ैर अब जैसे भी होनी है बसर हो जाएगी तुम ने ख़ुद ही सर चढ़ाई थी सो अब चक्खो मज़ा मैं न कहता था कि दुनिया दर्द-ए-सर हो जाएगी तल्ख़ियाँ भी लाज़मी हैं ज़िंदगी के वास्ते इतना मीठा बन के मत रहिए शकर हो जाएगी

Rahat Indori

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फ़ैसले लम्हात के नस्लों पे भारी हो गए बाप हाकिम था मगर बेटे भिकारी हो गए देवियाँ पहुँचीं थीं अपने बाल बिखराए हुए देवता मंदिर से निकले और पुजारी हो गए रौशनी की जंग में तारीकियाँ पैदा हुईं चाँद पागल हो गया तारे भिकारी हो गए रख दिए जाएँगे नेज़े लफ़्ज़ और होंटों के बीच ज़िल्ल-ए-सुब्हानी के अहकामात जारी हो गए नर्म-ओ-नाज़ुक हल्के-फुल्के रूई जैसे ख़्वाब थे आँसुओं में भीगने के बा'द भारी हो गए

Rahat Indori

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न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा इसी गली में वो भूका फ़क़ीर रहता था तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा

Rahat Indori

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मेरे अश्कों ने कई आँखों में जल-थल कर दिया एक पागल ने बहुत लोगों को पागल कर दिया अपनी पलकों पर सजा कर मेरे आँसू आप ने रास्ते की धूल को आँखों का काजल कर दिया मैं ने दिल दे कर उसे की थी वफ़ा की इब्तिदा उस ने धोका दे के ये क़िस्सा मुकम्मल कर दिया ये हवाएँ कब निगाहें फेर लें किस को ख़बर शोहरतों का तख़्त जब टूटा तो पैदल कर दिया देवताओं और ख़ुदाओं की लगाई आग ने देखते ही देखते बस्ती को जंगल कर दिया ज़ख़्म की सूरत नज़र आते हैं चेहरों के नुक़ूश हम ने आईनों को तहज़ीबों का मक़्तल कर दिया शहर में चर्चा है आख़िर ऐसी लड़की कौन है जिस ने अच्छे-ख़ासे इक शाइ'र को पागल कर दिया

Rahat Indori

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