ghazalKuch Alfaaz

न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा इसी गली में वो भूका फ़क़ीर रहता था तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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एक और शख़्स छोड़ कर चला गया तो क्या हुआ हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी तुम्हारा दुख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ

Tehzeeb Hafi

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आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँँ जाना है हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद' ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं

Jawwad Sheikh

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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जब से उस ने खींचा है खिड़की का पर्दा एक तरफ़ उस का कमरा एक तरफ़ है बाक़ी दुनिया एक तरफ़ मैं ने अब तक जितने भी लोगों में ख़ुद को बाँटा है बचपन से रखता आया हूँ तेरा हिस्सा एक तरफ़ एक तरफ़ मुझे जल्दी है उस के दिल में घर करने की एक तरफ़ वो कर देता है रफ़्ता रफ़्ता एक तरफ़ यूँँ तो आज भी तेरा दुख दिल दहला देता है लेकिन तुझ से जुदा होने के बा'द का पहला हफ़्ता एक तरफ़ उस की आँखों ने मुझ सेे मेरी ख़ुद्दारी छीनी वरना पाँव की ठोकर से कर देता था मैं दुनिया एक तरफ़ मेरी मर्ज़ी थी मैं ज़र्रे चुनता या लहरें चुनता उस ने सहरा एक तरफ़ रक्खा और दरिया एक तरफ़

Tehzeeb Hafi

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चेहरों की धूप आँखों की गहराई ले गया आईना सारे शहर की बीनाई ले गया डूबे हुए जहाज़ पे क्या तब्सिरा करें ये हादिसा तो सोच की गहराई ले गया हालाँकि बे-ज़बान था लेकिन अजीब था जो शख़्स मुझ से छीन के गोयाई ले गया मैं आज अपने घर से निकलने न पाऊँगा बस इक क़मीस थी जो मिरा भाई ले गया 'ग़ालिब' तुम्हारे वास्ते अब कुछ नहीं रहा गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया

Rahat Indori

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शाम ने जब पलकों पे आतिश-दान लिया कुछ यादों ने चुटकी में लोबान लिया दरवाज़ों ने अपनी आँखें नम कर लीं दीवारों ने अपना सीना तान लिया प्यास तो अपनी सात समुंदर जैसी थी नाहक़ हम ने बारिश का एहसान लिया मैं ने तलवों से बाँधी थी छाँव मगर शायद मुझ को सूरज ने पहचान लिया कितने सुख से धरती ओढ़ के सोए हैं हम ने अपनी माँ का कहना मान लिया

Rahat Indori

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शजर हैं अब समर-आसार मेरे चले आते हैं दावेदार मेरे मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं समुंदर हैं समुंदर पार मेरे अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें अगर चाहें तो ये बीमार मेरे हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन गए बेकार सारे वार मेरे मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे हँसी में टाल देना था मुझे भी ख़ता क्यूँँ हो गए सरकार मेरे तसव्वुर में न जाने कौन आया महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे तुम्हारा नाम दुनिया जानती है बहुत रुस्वा हैं अब अश'आर मेरे भँवर में रुक गई है नाव मेरी किनारे रह गए इस पार मेरे मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे

Rahat Indori

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सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है हमारे पाँव की मिट्टी ने सर उठाया है हमेशा सर पे रही इक चटान रिश्तों की ये बोझ वो है जिसे उम्र-भर उठाया है मिरी ग़ुलैल के पत्थर का कार-नामा था मगर ये कौन है जिस ने समर उठाया है यही ज़मीं में दबाएगा एक दिन हम को ये आसमान जिसे दोश पर उठाया है बुलंदियों को पता चल गया कि फिर मैं ने हवा का टूटा हुआ एक पर उठाया है महा-बली से बग़ावत बहुत ज़रूरी है क़दम ये हम ने समझ सोच कर उठाया है

Rahat Indori

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सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा मैं इस बहार में सब का हिसाब कर दूँगा मैं इंतिज़ार में हूँ तू कोई सवाल तो कर यक़ीन रख मैं तुझे ला-जवाब कर दूँगा हज़ार पर्दों में ख़ुद को छुपा के बैठ मगर तुझे कभी न कभी बे-नक़ाब कर दूँगा मुझे भरोसा है अपने लहू के क़तरों पर मैं नेज़े नेज़े को शाख़-ए-गुलाब कर दूँगा मुझे यक़ीन कि महफ़िल की रौशनी हूँ मैं उसे ये ख़ौफ़ कि महफ़िल ख़राब कर दूँगा मुझे गिलास के अंदर ही क़ैद रख वर्ना मैं सारे शहर का पानी शराब कर दूँगा महाजनों से कहो थोड़ा इंतिज़ार करें शराब-ख़ाने से आ कर हिसाब कर दूँगा

Rahat Indori

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