सवाल घर नहीं बुनियाद पर उठाया है हमारे पाँव की मिट्टी ने सर उठाया है हमेशा सर पे रही इक चटान रिश्तों की ये बोझ वो है जिसे उम्र-भर उठाया है मिरी ग़ुलैल के पत्थर का कार-नामा था मगर ये कौन है जिस ने समर उठाया है यही ज़मीं में दबाएगा एक दिन हम को ये आसमान जिसे दोश पर उठाया है बुलंदियों को पता चल गया कि फिर मैं ने हवा का टूटा हुआ एक पर उठाया है महा-बली से बग़ावत बहुत ज़रूरी है क़दम ये हम ने समझ सोच कर उठाया है
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई
Jaun Elia
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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना
Zubair Ali Tabish
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शजर हैं अब समर-आसार मेरे चले आते हैं दावेदार मेरे मुहाजिर हैं न अब अंसार मेरे मुख़ालिफ़ हैं बहुत इस बार मेरे यहाँ इक बूँद का मुहताज हूँ मैं समुंदर हैं समुंदर पार मेरे अभी मुर्दों में रूहें फूँक डालें अगर चाहें तो ये बीमार मेरे हवाएँ ओढ़ कर सोया था दुश्मन गए बेकार सारे वार मेरे मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे हँसी में टाल देना था मुझे भी ख़ता क्यूँँ हो गए सरकार मेरे तसव्वुर में न जाने कौन आया महक उट्ठे दर-ओ-दीवार मेरे तुम्हारा नाम दुनिया जानती है बहुत रुस्वा हैं अब अश'आर मेरे भँवर में रुक गई है नाव मेरी किनारे रह गए इस पार मेरे मैं ख़ुद अपनी हिफ़ाज़त कर रहा हूँ अभी सोए हैं पहरे-दार मेरे
Rahat Indori
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यूँँ सदा देते हुए तेरे ख़याल आते हैं जैसे का'बे की खुली छत पे बिलाल आते हैं रोज़ हम अश्कों से धो आते हैं दीवार-ए-हरम पगड़ियाँ रोज़ फ़रिश्तों की उछाल आते हैं हाथ अभी पीछे बंधे रहते हैं चुप रहते हैं देखना ये है तुझे कितने कमाल आते हैं चाँद सूरज मिरी चौखट पे कई सदियों से रोज़ लिक्खे हुए चेहरे पे सवाल आते हैं बे-हिसी मुर्दा-दिली रक़्स शराबें नग़्में बस इसी राह से क़ौमों पे ज़वाल आते हैं
Rahat Indori
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चेहरों की धूप आँखों की गहराई ले गया आईना सारे शहर की बीनाई ले गया डूबे हुए जहाज़ पे क्या तब्सिरा करें ये हादिसा तो सोच की गहराई ले गया हालाँकि बे-ज़बान था लेकिन अजीब था जो शख़्स मुझ से छीन के गोयाई ले गया मैं आज अपने घर से निकलने न पाऊँगा बस इक क़मीस थी जो मिरा भाई ले गया 'ग़ालिब' तुम्हारे वास्ते अब कुछ नहीं रहा गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया
Rahat Indori
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साथ मंज़िल थी मगर ख़ौफ़-ओ-ख़तर ऐसा था उम्र-भर चलते रहे लोग सफ़र ऐसा था जब वो आए तो मैं ख़ुश भी हुआ शर्मिंदा भी मेरी तक़दीर थी ऐसी मिरा घर ऐसा था हिफ़्ज़ थीं मुझ को भी चेहरों की किताबें क्या क्या दिल शिकस्ता था मगर तेज़ नज़र ऐसा था आग ओढ़े था मगर बाँट रहा था साया धूप के शहर में इक तन्हा शजर ऐसा था लोग ख़ुद अपने चराग़ों को बुझा कर सोए शहर में तेज़ हवाओं का असर ऐसा था
Rahat Indori
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वो इक इक बात पे रोने लगा था समुंदर आबरू खोने लगा था लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी मैं आँखें खोल कर सोने लगा था चुराता हूँ अब आँखें आइनों से ख़ुदा का सामना होने लगा था वो अब आईने धोता फिर रहा है उसे चेहरे पे शक होने लगा था मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया मैं सब के सामने रोने लगा था
Rahat Indori
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